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सख्ती के साथ समझदारी भी
नई दिल्ली
Updated Thu, 16 Apr 2015 08:55 PM IST
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महीनों बाद कश्मीर लौटे अलगाववादी नेता अली शाह गिलानी ने वर्षों बाद अपने भाषण में जिस तरह 'कश्मीरियों के आत्मनियंत्रण' का पुराना राग अलापा, और जेल से छूटे उनके शार्गिद मसर्रत आलम ने पाकिस्तानपरस्त नारे लगाए, वे घोर आपत्तिजनक होने के साथ-साथ ये भी बताते हैं कि मुट्ठी भर कट्टरवादी अब भी दीवार पर लिखी इबारत पढ़ना नहीं चाहते।
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गिलानी जिन कश्मीरियों की बात कर रहे हैं, उन्होंने कुछ ही महीने पहले लोकतंत्र के पर्व में बढ़-चढ़कर भाग लिया था, और तब उन जैसे अलगाववादियों के लिए खामोश रहने के सिवा कोई चारा नहीं था। घाटी में विकास के काम जिस तरह हो रहे हैं, कश्मीरी युवा जिस तरह राष्ट्रीय मुख्यधारा से जुड़ रहे हैं, और चुनावों में मतदाताओं की भागीदारी जिस रफ्तार से बढ़ रही है, उसके बाद वहां अलगाववादियों के लिए कोई गुंजाइश नहीं बची है, यह गिलानी से बेहतर भला और कौन जानेगा!
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खुद गिलानी और मसर्रत जैसे उनके चेले इसलिए भी अप्रासंगिक हैं कि वे हड़ताल, तोड़-फोड़ और पत्थरबाजी जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं, जिनसे कश्मीरियों का भला होना तो दूर, उलटे सैकड़ों की संख्या में लोगों की जान जाती है। मसर्रत आलम की ढीठता का नमूना देखिए-पहले उसने गिलानी की सभा में अपनी करतूत को जायज ठहराया, बाद में उसका कहना था कि पाकिस्तानी झंडे बाहर से आए लोगों ने लहराए थे! इन लोगों के खिलाफ अगर कार्रवाई नहीं की गई, तो ये जम्मू-कश्मीर की फिजा में जहर घोलने की कोशिश में किसी भी हद तक जा सकते हैं।
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इसलिए इस मामले में भाजपा का सख्त रुख समझ में आता है, अलबत्ता इस संवेदनशील मुद्दे पर उसे समझदारी का भी परिचय देना होगा। सूबे की नई सरकार को सुचारु रूप से चलने देने के लिए भाजपा ने अब तक जिस लचीलेपन का परिचय दिया है, उसकी जरूरत आगे भी पड़ेगी। इसलिए आक्रामक होकर ऐसा कोई कदम उठाने से बचना होगा, जिससे जम्मू-कश्मीर की लोकतांत्रिक प्रक्रिया और विकास पर प्रतिकूल असर पड़े। अलगाववादियों को अंकुश में रखना जितना जरूरी है, उतना ही आवश्यक यह है कि ऐसा कुछ भी न किया जाए, जिससे हाशिये पर जाते अलगाववादियों को अचानक सहानुभूति और समर्थन मिले।