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अंकों की टूटती सीमाएं
नई दिल्ली
Updated Fri, 30 May 2014 07:46 PM IST
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बीएसई के बारहवीं के नतीजे चौंकाते हैं। सिर्फ यही नहीं कि सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले दिल्ली के सार्थक अग्रवाल ने 99.6 फीसदी अंक हासिल किए हैं, बल्कि नब्बे और पिच्यानबे प्रतिशत अंक पाने वालों की संख्या भी पिछले साल की तुलना में बढ़ी है और पास करने वाले छात्रों की संख्या भी।
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इसी तरह लड़कियों ने फिर लड़कों को पीछे छोड़ दिया है। स्कूल की फीस चुकाने में असमर्थ दिल्ली की एक होनहार लड़की आर्ट्स में सर्वोच्च अंक ले आई है; छात्रवृत्ति और मुफ्त किताबों के जरिये पढ़ाई करने वाली एक मेधावी लड़की चौरानबे फीसदी से अधिक अंकों के साथ पास हुई है, तो घर में राजनीति और आंदोलनकारियों की लगातार सरगर्मियों के बावजूद अरविंद केजरीवाल की बेटी छियानबे प्रतिशत अंक लाने में कामयाब हुई है।
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ये तमाम उदाहरण बताते हैं कि प्रतिभा और महत्वाकांक्षा किसी की मोहताज नहीं हैं। सालोंसाल बेहतर होते रिजल्ट के पीछे सीबीएसई को तो श्रेय जाता ही है, खुद छात्रों के भीतर भी अच्छा करने की प्रवृत्ति निरंतर बढ़ रही है। लेकिन चिंता का कारण दूसरा है। अंकों की सीमा जैसा-जैसे ऊपर जा रही है, वैसे-वैसे अपेक्षाकृत कम नंबर लाने वालों के लिए परेशानियां बढ़ती जा रही हैं। जाहिर है, इसके लिए अंकों की बढ़ती होड़ नहीं, अच्छे कॉलेजों का अभाव जिम्मेदार है। अभी हालत यह है कि पिच्यानबे फीसदी से अधिक अंक हासिल करने वाले अनेक छात्रों को नामचीन कॉलेजों में दाखिला मिलना मुश्किल हो जाता है।
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अंकों की दौड़ में थोड़ा-सा भी पिछड़ने वाले हजारों छात्रों को तो दूसरे कॉलेजों या निजी विश्वविद्यालयों में मजबूरी में प्रवेश लेना पड़ता है या पत्राचार के जरिये पढ़ाई जारी रखनी पड़ती है। पचहत्तर फीसदी अंक पाने के बावजूद एक छात्र अगर इस हताशा में घर छोड़ जाता है कि उसे अच्छे कॉलेज में एडमिशन नहीं मिलेगा, तो यह वाकई स्तब्ध करने वाली स्थिति है। उच्च शिक्षा में तस्वीर बदल देने के वायदे तो बहुत किए गए, पर छात्रों की संख्या और अंकों के अनुरूप कॉलेजों की उपलब्धता के समुचित प्रयास नहीं किए गए।
यह बहुत बड़ी उपलब्धि है कि हमारे होनहार अंकों की हर सीमा को पीछा छोड़ रहे हैं, पर अच्छा तो तब होगा, जब अपेक्षाकृत कम अंक लाने वाले भी अपनी पसंद के कॉलेज और पाठ्यक्रम से वंचित न हों।