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देवघर में भगदड़

Mon, 10 Aug 2015 08:11 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Mon, 10 Aug 2015 08:11 PM IST
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stampade in deoghar

झारखंड के देवघर स्थित बैद्यनाथ धाम में जलाभिषेक के लिए आए 11 श्रद्धालुओं की भगदड़ में हुई मौत बताती है कि ऐसे मौकों पर भीड़ को नियंत्रित करने में हमारा तंत्र कितना नाकाम हो जाता है। किसी धार्मिक स्थल पर भगदड़ मचने का यह पहला मामला नहीं है। पिछले महीने ही आंध्र प्रदेश के राजमुंद्री में गोदावरी नदी के किनारे पुष्करालु उत्सव के दौरान भी भगदड़ मच गई थी, जिसमें 27 लोगों की मौत हो गई थी। यदि आंकड़े गिनने लगें, तो यह सूची काफी लंबी हो जाएगी।

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एक अध्ययन के मुताबिक, पिछले दशक में धार्मिक स्थलों में हुई भगदड़ों में करीब एक हजार लोगों की मौत हो चुकी है! धार्मिक स्थलों में श्रद्धालुओं की भीड़ कोई नई बात नहीं है। बैद्यनाथ धाम की यात्रा को देश में कठिन धार्मिक यात्राओं में गिना जाता है, जिसमें श्रद्धालु कई किलोमीटर पैदल चलकर वहां पहुंचते हैं। इस हादसे के जो ब्योरे आए हैं, उससे पता चलता है कि श्रद्धालुओं को रस्सी के बेरिकेड्स के सहारे नियंत्रित किया जा रहा था और मंदिर में दर्शन के लिए कई किलोमीटर दूर तक लोगों की कतार लगी हुई थी। चूंकि सावन के सोमवार को वहां हर बार अधिक संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं, लिहाजा प्रशासन और मंदिर प्रबंधन को अधिक एहतियात बरतने की जरूरत थी।
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हालांकि यह भी सच है कि आस्था के आगे सारी व्यवस्थाएं धरी की धरी रह जाती हैं। दरअसल धार्मिक स्थलों की व्यवस्थाओं का हाल भी उसी तरह हो गया है, जैसा कि बढ़ती आबादी के दबाव में हमारे बुनियादी ढांचे का होता जा रहा है। मसलन यही देखा जा सकता है कि किस तरह उत्तर भारत में कांवड़ियों की बढ़ती संख्या के कारण प्रशासन की तैयारियां नाकाफी साबित हो जाती हैं।
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बैद्यनाथ धाम को ही देखें, तो वहां सोमवार तड़के ही एक लाख से अधिक श्रद्धालु जुटे थे, जिसका प्रशासन ठोस अनुमान नहीं लगा सका। चूंकि बैद्यनाथ मंदिर सहित अनेक धार्मिक स्थलों में जगह इतनी कम है कि वहां कोई अतिरिक्त निर्माण नहीं हो सकता, लिहाजा एक समय में बेहद अनुशासन के साथ सीमित संख्या में ही लोग वहां पूजा कर सकते हैं। असल में धार्मिक स्थलों पर जुटने वाली भीड़ को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन को तो मुस्तैद रहने की जरूरत है ही, श्रद्धालुओं को भी संयम बरतना चाहिए।

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