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जाने ये कौन मेरी रूह को छूकर गुजरा ...

Mon, 22 Feb 2016 04:28 PM IST
वेद विलास उनियाल/ अमर उजाला, दिल्ली
वेद विलास उनियाल/ अमर उजाला, दिल्ली Updated Mon, 22 Feb 2016 04:28 PM IST
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special article on kabban mirza

कब्बन मिर्जा की याद हमेशा मन में बनी रही है। वो क्षण था जब वरली के आकाशवाणी भवन के बाहर आते हुए कब्बन ने कहा था, भाई इस बात का गम न करो, कि मैं केवल दो गाने गा पाया। मुझे इसका सुकून है कि भारतीय फिल्म जगत में जो बेशुमार बेहतरीन गाने बने हैं उसमें दो गाने मुझे भी गाने को मिले हैं।

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खैय्याम साहब ने मेरे लिए अवसर बनाया। उस ऊपर वाले का अहसान कि पहले रेडियो में लोगों को दूसरों के गीत सुनाए और उन गाने वालों में मैं भी शामिल हूं। जब भी लोग  मेरे गीतों को सुनने के लिए कहीं फरमाइश करेंगे मेरी रूह को जरूर चैन मिलता रहेगा। 
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कोई बात नहीं अब गाने नहीं गा सकता, लेकिन अब जिंदगी का कुछ समय है मेरे पास। मैं कब्बनजी को देखता रहा। मेरी आंखे पहले से नम थी। कब्बन ने कहा तो मैं अपने को संभाल न सका। मैंने कहा अल्लाह आपको बड़ी उम्र देगा।  आपके यो दो गीत ही सही। पर ये अनमोल है।
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कब्बनजी बहुत प्यार से कहा था आफिस में ये मिलना क्या मिलना। जल्दी मुंब्रा में घर पर आना। तब नहीं जानता था कि कब्बनजी से यह आखिरी बार का मिलना है। हां जब लौट रहा था तो मेरे मन में वही गीत घुमड़ रहा था, तेरा हिज्र मेरा नसीब है, तेरा गम मेरी हयात है। मुझे तेरी दूरी का गम हो क्यों , तू कहीं भी है मेरे पास है। निदाजी का लिखा हुआ यह गीत कब्बनजी ने गाया था। क्या खूब गाया था।

कब्बनजी से जो मुलाकात थी, उसे एक लेख के रूप में मैंने इंडियन एक्सप्रेस के स्करीन अखबार में दिया था। अमूमन फिल्म संगीत या फिल्म गीत संगीत पर कोई लेख या कवर स्टोरी लिखनी होती थी तो मैं जनसत्ता की पत्रिका सबंरग मे ही लिखा करता था। धीरेंद्र अस्थानाजी उस पत्रिका के फीचर संपादक थे। सबरंग थी तो मुंबई की नगर पत्रिका।

लेकिन यह देश भर में बडे रुझान से पढ़ी जाती थी। इस बार न जाने क्यों मैंने कब्बनजी पर लिखा और उसे स्करीन में दिया था। उस रोज जब वरली से उन्हें मिलकर आया था, वह कब्बनजी से पहली मुलाकात और आखिरी मुलाकात थी। लेकिन विविध भारती में उनके छायागीत को प्रस्तुत करने के अंदाज बहुत भाय़ा था।

इसलिए मुंबई में फोन पर उनसे कभी कभी बात कर लेता था। बस मिलना नहीं हो पा रहा था। एक दिन खैय्याम साहब पर  सबरग के लिए कवर स्टोरी लिखने का मन हुआ तो उनके घर पर ही पहुंचा।

खैय्याम साहब से बातों का सिलसिले में लाहौर की बात से शुरू हुई थी। उन्होंने उस्ताद झंडे खां और हुस्नलाल भगतराम की जोड़ी के संगीत पर भी कहा था। और फिर वह वह बहुत सी बातें फिर सुबह होगी,  कभी कभी, नूरी, उमराव जान पर की थी। खासकर उमराव जान फिल्म में आशाजी की गायकी और रेखाजी के अभिनय पर उन्होंने बहुत कुछ बताया था। उस समय ही कब्बन मिर्जा पर बात हुई थी। रेडियो एनाउंसर थे। 

उनकी जान पहचान नहीं थी कब्बनजी से। रजिया सुल्तान मे गुलाम याकुब के लिए वह किसी पाठदार आवाज की तलाश में थे। कई गायकों का टेस्ट ले चुके थे। लेकिन बात नहीं जम रही थी। तब किसी ने उन्हें कब्बन मिर्जा का नाम बताया था। विविध भारती की एक चर्चित आवाज। और कुछ महफिलों में गीत गाने गुनगुनाने वाले कब्बन मिर्जा।  फरमान पहुंचा तो वह खैय्याम साहब के संगीत कक्ष में पहुंचे।

आवाज की परख के लिए खैय्याम ने उन्हें मोहर्रम के समय गाए जाने वाले मर्सिया नोहे गाने के लिए कहा। कब्बन ने जैसे ही गाना शुरू किया खैय्याम समझ गए कि उनकी तलाश पूरी हुई। इसी आवाज की उन्हें तलाश थी। बहुत सधे हुए ढंग से खैय्याम ने उन्हें गवाना शुरू किया, आई जंजीर की झंकार खुदा खैर करे। इसके बाद तेरा हिज्र मेरा नसीब है। दोनों गीतों की धुन मुश्किल थी। लेकिन कब्बन ने उस धुन को साध लिया। चौथे दिन कब्बन ने पहले गीत की रिकार्डिंग भी कर ली।

रजिया सुल्तान धमेंद्र और हेमामालिनी की फिल्म थी। जाहिर है हेमा रजिया और धमेद्र याकूब बने। धमेंद्र के लिए तो मुकेश ने भी गाया। लेकिन यहां वह  जिस तरह की भूमिका में थे, वहा एक अलग आवाज उनके अपने व्यक्तित्व के साथ न्याय कर रही थी। यह एक हब्शी याकूब के लिए आवाज थी। एक भारी लेकिन असर छोड़ती आवाज। फिल्म तो नहीं चली। लेकिन कब्बन मिर्जा के गीत घर घर गूंजने लगे।

उनके गीतों को लोगों ने रिकार्ड में बार बार सुना। इससे पहले कब्बन जी का परिचय एक रेडियो एनाउंसर के रूप में ही थी। गीत संगीत तो उनके जीवन में था। इसलिए विविध भारती मे शाम एक आवाज गूंजती थी, छाया गीत सुनने वालों को कब्बन मिर्जा का आदाब। रेडियो के श्रोता इस आवाज के भी दिवाने थे।

रेडियो की दुनिया में बृजमोहन, विनोद शर्मा, देवकीनंदन पांडे जैसे लोगों की आवाज फिल्म और विज्ञापनों के लिए तलाशी जाती रही। लेकिन कोई रेडियो उद्घोषक गायक के तौर पर शोहरत पा गया था। सबको लगता था कि खैय्याम साहब ने जिस शख्स से इतने सुंदर गीत गवाए वो आगे भी बहुत से गीत गाएगा। न जाने कितनी सांस्कृतिक शामों में उनको रूबरू देखने सुनने का मौका मिलेगा।

लेकिन कब्बन मिर्जा से बात करते करते मैं भी उस क्षण ठिठक गया था। मुझे जानकारी नहीं थी । मेरा पूछना स्वाभाविक था। मैंने कहा कब्बनजी आपके दो इतने खूबसूरत गीत। फिर आगे क्यों नहीं गाया। आपको क्या अवसर नहीं मिला। तब उन्होंने बताया कि उनके नसीब में बस उतना ही था। उन गीतों से खूब चर्चा मिली। लोग मुबारक देते थे, लेकिन आगे का अंधेरा किसने देखा होता है दोस्त।

एक तरफ रजिया सुल्तान के गीत बज रहे थे वही मेरे लिए डाक्टर एक बुरी खबर भी लाया था। मुझे कैंसर हो गया था। जसलोक में इलाज करवाया।  खुदा का शुक्र है कि जिंदगी बच गई लेकिन मुझसे कुछ छिन गया। मेरा गला हमेशा के लिए खराब हो गया मैं गा नहीं सकता। बस ये दो गीत तुम्हारे लिए अमानत है।  वैसे अब ठीक हूं।

डाक्टरों ने कहा कि जिंदगी बच गई है। बस मुझे याद करना और इन गीतों को सुनना। मैं चुप हो गया। फिर लगा कि कुछ न बोलूं। लगा कि एक क्षण बाहर निकल जाऊं। कब्बनजी से नजर नहीं मिला पा रहा था। आंख छलक रही थीं। मैंने धीरे धीरे कहना शुरू किया।

कब्बन जी आपको हम रेडियो में सुनते रहे। फिर आपके गीत भी सुने। लेकिन इन हालातों का पता न था। आपसे यह सवाल नहीं पूछता। गिनती पर न जाऊं लेकिन आपके ये दो गीत बहुत अनमोल है। मुझे बहुत अच्छे लगते हैं। आप स्वस्थ होना, यह बहुत अच्छा है। आपसे रेडियो पर भी बहुत कुछ बात करना चाहता था लेकिन अब आज मन नहीं करता। मुझे विदा दीजिए। फिर आऊंगा। कब्बनजी ने तब कहा था जरूर घर पर आना। घर पर सबसे मिलाऊंगा।

मगर जाना न हुआ। एक दिन उनके जाने की खबर आई। हां जिस रोज कब्बनजी पर लेख लिखा था उनका बेटा इंडियन एक्सप्रेस में आया था। कब्बनजी पर लिखे लेख के लिए वह स्कीन लेने आया था। फिर कभी उस परिवार से मिलना संभव न हो सका।


मुझे मालूम नहीं अब कब्बनजी का परिवार कहां रहता है। पर उनके गाए गीत को मैं अक्सर सुनता हूं। ऐसे समय जब निदा फाजली भी इस दुनिया से चले गए, हमारे पास यादों में वही गीत है। सुनने के लिए, और रह रहकर गुनगुनाने के लिए। कब्बनजी और निदाजी अब यादों में हैं।

''तेरा हिज्र मेरा नसीब है, तेरा गम मेरी हयात है।
 तेरा गम ही मेरी हयात है।
 मुझे तेरी दूरी का गम हो क्यों
 तू कहं भी हो मेरे साथ है।

  मेरे वास्ते तेरे नाम पर
  कोई हर्फ आए नहीं नहीं
 मुझे खौफ ए दुनिया नहीं
 मगर मेरे रूबरू तेरी जात है

 तेरा इश्क  मुझपे है मेहरंबा
 मेरे दिल को हासिल है दो जहां
 मेरी जान ए  जा इसी बात पर
 मेरी जान जाए तो बात है।''


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