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नन्हीं वानी की आवाज ने बचा ली पांच जिंदगियां
अमर उजाला ब्यूरो/ रोहतक
Updated Mon, 15 Sep 2014 02:09 AM IST
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तीन साल की नन्हीं वानी की एक पुकार ने अंकुर अरोड़ा के परिवार की जिंदगी बचा ली। तीन मंजिल तक पानी पहुंचने के बाद तेज बहाव के बीच छत पर बैठा परिवार मदद के लिए चिल्लाते- चिल्लाते थक चुका था।
जिंदगी की उम्मीद भी लगभग खत्म सी हो गई थी। शाम हो रही थी, करीब 15 घंटे बाद अचानक तीन साल की बेटी वानी ने चिल्लाना शुरू कर दिया।
पानी से बचा लो अंकल। बच्ची की मासूम आवाज को सुनकर वहां से जा रहा एक नाविक तेज बहाव के विपरीत जान पर खेलते हुए उनके मकान तक पहुंच गया।
एक-एक करके सभी को नाव में बैठाया और फिर किसी तरह से किनारे लाकर उनकी जान बचाई। उतरते ही सभी ने वानी को गले से लगा लिया, हर किसी की आंखों से जिंदगी की इस जीत के आंसू छलक रहे थे।
रोहतक के गांधीनगर मोहल्ला निवासी नरेंद्र पाल अरोड़ा के बेटे अंकुर अरोड़ा कश्मीर के वीवीआईपी एरिया राजबाग में रहते हैं। वे वहां एक टेलीकॉम कंपनी में मैनेजर हैं। रविवार को रोहतक पहुंचने के बाद अंकुर ने जिंदगी और मौत के बीच इस सैलाब को बयां करते हुए वहां के लोगों का ही शुक्रगुजार करते नजर आए।
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कश्मीर में छह सितंबर को आए सैलाब के कहर से राजबाग भी प्रभावित हुआ। इस एरिया के करीब 300 मकान सैलाब में बह गए परिवारों का क्या हुआ किसी को नहीं पता। बीते रविवार को भोर में लगभग 3 बजे अंकुर के मकान में भी धीरे-धीरे पानी भर रहा था। उस समय मकान में अंकुर अरोड़ा, उनकी पत्नी निशा पाल, 3 साल की बेटी के अलावा कश्मीर घूमने गए उनके ससुर रमेश चंद्र छाबड़ा और सास सुदेश छाबड़ा भी मौजूद थे। देखते ही देखते पानी का बहाव तेज होता गया और तीन मंजिल के मकान का पहला हिस्सा डूबने लगा। जान बचाने के लिए सभी लोग दूसरी मंजिल पहुंचे वहां भी पानी का स्तर बढ़ता देख तीसरे मंजिल पर जाकर शरण ली।
पानी बढ़ने के साथ बढ़ रही थी धड़कन
अंकुर ने बताया कि शाम हो रही थी और पानी का स्तर भी बढ़ रहा था। आस-पास के लोग जल स्तर बढ़ने से एक दिन पहले ही मकान छोड़कर चले गए थे। जब तक इन्हें पता चला कि आस-पास बहाव इतना तेज था कि उस एरिया में भी कोई जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। धीरे-धीरे पानी तीसरी मंजिल की छत तक पहुंचने लगा। सभी एक दूसरे को पकड़ कर भगवान से जिंदगी की दुआ मांगते हुए चिल्ला रहे थे। थोड़ी देर में सभी थक कर बैठ गए। अब चिल्लाने की ताकत किसी में नहीं थी।
मुसलमान नाविक ने बचाई जान
लगभग शाम का छह बजा था। न जाने वानी ने कैसे उस नाविक को देखकर आवाज दे दी कि अंकल पानी से बचा लो। बहाव की वजह से नाविक हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था लेकिन किसी तरह से बहाव के विपरीत मौत से लड़ता हुआ नाव को मकान तक ले आया। जल्दी-जल्दी हमें नाव में उतारकर वह एक मस्जिद में ले गया। तब जाकर हमें पता चला कि हमारी जिंदगी बचाने वाला कोई और नहीं एक मुसलमान है। वह से एक अब्दुल कय्यूम का परिवार अपने घर ले गया। हम वहां चार दिन रहे। उन्होंने किसी न किसी तरह से हमें खाना खिलाया और बच्ची के लिए दूध का इंतजाम किया। इन लोगों ने मदद करने वाले नाविक से लेकर जहां विश्राम किया उन परिवारों को पैसा देने की कोशिश की। लेकिन उन लोगों ने मदद के बदले पैसा लेने से साफ इंकार कर दिया। बोले मानवता भी कोई चीज होती है। फिर वहां से एक मुस्लिम नाविक डलगेट झेलम नदी पर स्थित अब्दुल्ला ब्रिज हमें लेकर आया। फिर वहां से पैदल पहाड़ी चढ़कर राजभवन पहुंचे। शुक्रवार को राजभवन से हेलीकाप्टर से एयरपोर्ट भेजा गया। एयरपोर्ट से शाम 5 बजेे सेना के हेलीकाप्टर से इनको चंडीगढ़ भेजा गया। शनिवार को चंडीगढ़ में अपने एक रिश्तेदार के पास रुके। चंडीगढ़ में कपड़े खरीदकर चेंज किया। फिर बस पकड़कर सीधे रोहतक आ गए। घर पहुंचते ही माता-पिता और दादी लाजवंती बेटे, बहू और बच्ची से लिपटकर रोने लगे।
सब कुछ बह गया सैलाब में
बाढ़ के कहर में इनका घर, सारा सामान, नई कार सहित 15 लाख की संपत्ति सब खत्म हो गया। इसके बावजूद सैलाब से लड़ते हुए अंकुर अरोड़ा की पत्नी निशा मंदिर से लड्डू गोपाल और माता रानी की मूर्ति को वहां नहीं छोड़ा और उनको साथ ले आई हैं। कहती हैं कि इनकी कृपा से ही हम सलामत बच आए हैं। वरना कितने के तो घर भी बह गए।
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जिंदगी की उम्मीद भी लगभग खत्म सी हो गई थी। शाम हो रही थी, करीब 15 घंटे बाद अचानक तीन साल की बेटी वानी ने चिल्लाना शुरू कर दिया।
पानी से बचा लो अंकल। बच्ची की मासूम आवाज को सुनकर वहां से जा रहा एक नाविक तेज बहाव के विपरीत जान पर खेलते हुए उनके मकान तक पहुंच गया।
एक-एक करके सभी को नाव में बैठाया और फिर किसी तरह से किनारे लाकर उनकी जान बचाई। उतरते ही सभी ने वानी को गले से लगा लिया, हर किसी की आंखों से जिंदगी की इस जीत के आंसू छलक रहे थे।
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रोहतक के गांधीनगर मोहल्ला निवासी नरेंद्र पाल अरोड़ा के बेटे अंकुर अरोड़ा कश्मीर के वीवीआईपी एरिया राजबाग में रहते हैं। वे वहां एक टेलीकॉम कंपनी में मैनेजर हैं। रविवार को रोहतक पहुंचने के बाद अंकुर ने जिंदगी और मौत के बीच इस सैलाब को बयां करते हुए वहां के लोगों का ही शुक्रगुजार करते नजर आए।
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कश्मीर में छह सितंबर को आए सैलाब के कहर से राजबाग भी प्रभावित हुआ। इस एरिया के करीब 300 मकान सैलाब में बह गए परिवारों का क्या हुआ किसी को नहीं पता। बीते रविवार को भोर में लगभग 3 बजे अंकुर के मकान में भी धीरे-धीरे पानी भर रहा था। उस समय मकान में अंकुर अरोड़ा, उनकी पत्नी निशा पाल, 3 साल की बेटी के अलावा कश्मीर घूमने गए उनके ससुर रमेश चंद्र छाबड़ा और सास सुदेश छाबड़ा भी मौजूद थे। देखते ही देखते पानी का बहाव तेज होता गया और तीन मंजिल के मकान का पहला हिस्सा डूबने लगा। जान बचाने के लिए सभी लोग दूसरी मंजिल पहुंचे वहां भी पानी का स्तर बढ़ता देख तीसरे मंजिल पर जाकर शरण ली।
पानी बढ़ने के साथ बढ़ रही थी धड़कन
अंकुर ने बताया कि शाम हो रही थी और पानी का स्तर भी बढ़ रहा था। आस-पास के लोग जल स्तर बढ़ने से एक दिन पहले ही मकान छोड़कर चले गए थे। जब तक इन्हें पता चला कि आस-पास बहाव इतना तेज था कि उस एरिया में भी कोई जाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था। धीरे-धीरे पानी तीसरी मंजिल की छत तक पहुंचने लगा। सभी एक दूसरे को पकड़ कर भगवान से जिंदगी की दुआ मांगते हुए चिल्ला रहे थे। थोड़ी देर में सभी थक कर बैठ गए। अब चिल्लाने की ताकत किसी में नहीं थी।
मुसलमान नाविक ने बचाई जान
लगभग शाम का छह बजा था। न जाने वानी ने कैसे उस नाविक को देखकर आवाज दे दी कि अंकल पानी से बचा लो। बहाव की वजह से नाविक हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था लेकिन किसी तरह से बहाव के विपरीत मौत से लड़ता हुआ नाव को मकान तक ले आया। जल्दी-जल्दी हमें नाव में उतारकर वह एक मस्जिद में ले गया। तब जाकर हमें पता चला कि हमारी जिंदगी बचाने वाला कोई और नहीं एक मुसलमान है। वह से एक अब्दुल कय्यूम का परिवार अपने घर ले गया। हम वहां चार दिन रहे। उन्होंने किसी न किसी तरह से हमें खाना खिलाया और बच्ची के लिए दूध का इंतजाम किया। इन लोगों ने मदद करने वाले नाविक से लेकर जहां विश्राम किया उन परिवारों को पैसा देने की कोशिश की। लेकिन उन लोगों ने मदद के बदले पैसा लेने से साफ इंकार कर दिया। बोले मानवता भी कोई चीज होती है। फिर वहां से एक मुस्लिम नाविक डलगेट झेलम नदी पर स्थित अब्दुल्ला ब्रिज हमें लेकर आया। फिर वहां से पैदल पहाड़ी चढ़कर राजभवन पहुंचे। शुक्रवार को राजभवन से हेलीकाप्टर से एयरपोर्ट भेजा गया। एयरपोर्ट से शाम 5 बजेे सेना के हेलीकाप्टर से इनको चंडीगढ़ भेजा गया। शनिवार को चंडीगढ़ में अपने एक रिश्तेदार के पास रुके। चंडीगढ़ में कपड़े खरीदकर चेंज किया। फिर बस पकड़कर सीधे रोहतक आ गए। घर पहुंचते ही माता-पिता और दादी लाजवंती बेटे, बहू और बच्ची से लिपटकर रोने लगे।
सब कुछ बह गया सैलाब में
बाढ़ के कहर में इनका घर, सारा सामान, नई कार सहित 15 लाख की संपत्ति सब खत्म हो गया। इसके बावजूद सैलाब से लड़ते हुए अंकुर अरोड़ा की पत्नी निशा मंदिर से लड्डू गोपाल और माता रानी की मूर्ति को वहां नहीं छोड़ा और उनको साथ ले आई हैं। कहती हैं कि इनकी कृपा से ही हम सलामत बच आए हैं। वरना कितने के तो घर भी बह गए।