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थोड़ा सुधार, ज्यादा राजनीति

Wed, 27 Feb 2013 12:40 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Wed, 27 Feb 2013 12:40 PM IST
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slightly improved, more politics

यह सही है कि चुनावी साल होने के बावजूद यूपीए सरकार के इस आखिरी रेल बजट में आर्थिक साहस और प्रतिबद्धता के थोड़े-बहुत सुबूत दिखते हैं।

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मसलन, यात्री किराया बढ़ाने के बाद बजट में माल भाड़ा करीब पांच प्रतिशत बढ़ाने, ईंधन के मूल्य को किराये में समायोजित करने के लिए रेल किराया आयोग गठित करने, पटरियों के दोहरीकरण-यात्री सुरक्षा और रेलकर्मियों के कल्याण के लिए आवंटन सोलह प्रतिशत बढ़ाने, खदानों और बंदरगाहों को जोड़ने वाले रेल नेटवर्क को गति देने और परिचालन अनुपात को मौजूदा 88.8 प्रतिशत से नीचे ले जाने की प्रतिबद्धता जैसे कई कदम हैं, जो आर्थिक सुधार का संकेत देते हैं।
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पर मुश्किल यह है कि इससे आगे बजट में उसी राजनीति के दर्शन होते हैं, जो गठबंधन सरकार के रेल बजट में हम हर साल देखते आए हैं। ईंधन के दाम कोई आज नहीं बढ़े हैं; ऐसे में करीब दस साल तक यात्री किराया न बढ़ाकर एक ही साल में बजट से पहले किराया बढ़ाकर, और बजट में किराये को न छेड़ते हुए भी सफर महंगा करने की चालाकी को आखिर क्या कहा जाए! इस राजनीति को भी क्या कहेंगे, जिसके तहत अमेठी और रायबरेली को बार-बार उपकृत करते हुए उत्तर प्रदेश के उन पिछड़े इलाकों की अनदेखी कर दी जाती है, जो फिलहाल कांग्रेस के वोट बैंक नहीं हैं!
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सिर्फ यही नहीं कि इस बजट में रेल पटरियां बढ़ाने, यात्री सुरक्षा पर अनिल काकोदकर और सैम पित्रोदा के सुझावों पर अमल करने और भारतीय रेल की तस्वीर बदलने वाले डेडीकेटेड फ्रेट कॉरिडोर की दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं है, यह भी कि बड़ी-बड़ी सुविधाओं के ऐलान के बीच उन आम यात्रियों के हक में कदम नहीं है, जो समय पर और सुरक्षित रेल यात्रा के अलावा, साफ-सफाई और पेयजल की सुविधा से ज्यादा कुछ नहीं चाहते।

दीर्घावधि की सोच और योजना के अभाव में भारतीय रेल को पटरी पर नहीं लाया जा सकता। लेकिन कांग्रेस को राजनीतिक लाभ दिलाने वाली कुछ घोषणाएं और ईंधन के बढ़ते मूल्य की चिंता के बीच लगभग सौ नई रेलगाड़ियों का ऐलान एक ऐसे रेल मंत्री के बारे में बताता है, जो शुरुआती साहस दिखाने के बाद लोकलुभावन राजनीति के आगे आत्मसमर्पण कर देता है।

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