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गरीबी घटाने का कौशल
नई दिल्ली
Updated Thu, 25 Jul 2013 04:12 AM IST
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झूठ के बारे में कहा जाता है कि यह तीन तरह का होता है, झूठ, सफेद झूठ और आंकड़े! ऐसा लगता है कि गरीबी के अपने नए आंकड़ों के साथ योजना आयोग इस जुमले को सच करता नजर आ रहा है। उसने गरीबी के जो ताजा आंकड़े जारी किए हैं, उस पर विपक्षी दलों को ही नहीं, यूपीए सरकार के प्रमुख घटक राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी तक को यकीन नहीं है।
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हैरत की बात है कि जिस सुरेश तेंदुलकर समिति के गरीबी आंकने के पैमाने और तौर-तरीकों पर पहले ही सवाल उठाए गए हैं, उसे आधार बनाकर नए आंकड़े जारी किए गए हैं और दावा किया जा रहा है कि 2004-05 से 2011-12 के दौरान गरीबी में रिकॉर्ड 15 फीसदी की गिरावट आई है, नतीजतन अब देश में सिर्फ 21.9 फीसदी गरीब रह गए हैं।
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तेंदुलकर समिति ने दैनिक खपत के आधार पर गरीबों की संख्या निर्धारित की थी, और इन वर्षों में महंगाई की जो रफ्तार रही है, उसमें यह अंदाजा लगाना वाकई बहुत मुश्किल है कि आखिर कोई व्यक्ति महज 27 रुपये बीस पैसे (ग्रामीण क्षेत्र में) में कैसे गुजर-बसर कर सकता है। शहरी क्षेत्र में 33 रुपये तीस पैसे को पर्याप्त माना गया है और इसी आधार पर योजना आयोग का दावा है कि शहरी क्षेत्र में गरीबी अब महज 13 फीसदी रह गई है! ये आंकड़े जमीनी हकीकत से बहुत दूर लगते हैं और इन्हें संभवतः राजनीतिक कारणों से हड़बड़ी में जारी किया गया है।
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असल में पिछले वर्ष जब गरीबी के आंकड़े जारी किए गए थे, तब भी काफी विवाद हुआ था और उसके बाद सी रंगराजन कमेटी का गठन किया गया था, जिसकी रिपोर्ट 2014 के मध्य तक ही मिलने की उम्मीद है और तब तक आम चुनाव हो चुके होंगे। जाहिर है, अपनी चुनावी तैयारियों में जुटी सरकार तब तक इंतजार नहीं कर सकती।
ऐसे में यदि कुछ विशेषज्ञ इन घटते आंकड़ों को गरीबों को सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों से वंचित करने के कौशल के रूप में भी देख रहे हैं, तो गलत नहीं है। यह विडंबना ही है कि सरकार की विभिन्न एजेंसियों और विभागों में ही गरीबी के आंकड़ों को लेकर कोई साम्य नहीं है और गरीबी को देखने के लिए जिस व्यावहारिक दृष्टि की जरूरत है, योजना भवन में बैठे लोगों में उसका नितांत अभाव दिखता है।