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कठोर बजट का संकेत

Sun, 31 Jan 2016 07:31 PM IST
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sun, 31 Jan 2016 07:31 PM IST
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Signals of hard budget

वैश्विक अर्थव्यवस्था की गंभीर स्थिति के बावजूद विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसी संस्थाओं ने भारत के प्रति जो भरोसा जताया, उससे उम्मीदें जगी थीं, लेकिन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कठोर बजट के बारे में इशारा कर बता दिया है कि चीजें उतनी सुखद नहीं हैं। वित्त मंत्री कह रहे हैं कि आगामी बजट लोकलुभावन होने के बजाय आर्थिक विकास और करों में बढ़ोतरी पर केंद्रित होगा।

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वित्त राज्यमंत्री जयंत सिन्हा का कहना है कि आगामी बजट अगले दो-तीन वर्षों का रोडमैप होगा। सच यह है कि इस सरकार ने जिन 'अच्छे दिनों' का वायदा किया था, कम से कम बजट में तो वह अभी तक नहीं दिखा है। खुद प्रधानमंत्री भी कह चुके हैं कि सिर्फ बेहद जरूरी सब्सिडी को ही जारी रखा जाएगा। रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन भी बढ़ते वित्तीय घाटे पर चिंता जता चुके हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था वाकई एक अजीब मोड़ पर खड़ी है, जहां लंबे समय से कच्चे तेल में आई कमी का भी उसे कोई लाभ नहीं मिल रहा। अमूमन ईंधन के दाम घटने से महंगाई घटती है, लेकिन यहां महंगाई सिर्फ आंकड़ों में कम हुई है।
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मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर की हालत खराब है, जीएसटी के लटके होने के कारण निवेश रफ्तार नहीं पकड़ पा रहा, सार्वजनिक बैंकों द्वारा दिए गए कर्ज के एक बड़े हिस्से की वसूली नहीं हो पाई है, और कर्ज सस्ता नहीं होने के कारण औद्योगिक उत्पादन की रफ्तार सुस्त है। वैश्विक सुस्ती की स्थिति में कुछ मजबूरियां तो समझ में आती हैं, लेकिन मुश्किल यह है कि हम अपनी विशाल अर्थव्यवस्था को आंतरिक रूप से भी गति नहीं दे पा रहे। वित्त मंत्रालय कह रहा है कि आगामी बजट में कृषि और उद्योग में बेहतर संतुलन बनाना उसकी प्राथमिकता में है; सिंचाई सुविधाएं मजबूत करने की भी वह बात कर रहा है, लेकिन देखना यह है कि खेती-किसानी पर ध्यान देने की उसकी यह प्रतिबद्धता बजट में कितनी दिखाई देती है।
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सवाल नौकरीपेशा मध्यवर्ग का भी है, जो बजट में टैक्स के मोर्चे पर कुछ राहत की उम्मीद करता है। लेकिन लगता नहीं कि बजट में नौकरीपेशा मध्यवर्ग को कुछ राहत मिल पाएगी। पर सवाल यह भी है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की मौजूदा स्थिति को देखते हुए ग्रोथ आधारित बजट का क्या सचमुच कोई लाभ होगा।

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