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वह गई ख्वाबों को भी ले गई...
अमर उजाला ब्यूरो/ रोहतक
Updated Wed, 24 Sep 2014 02:47 AM IST
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वह महज 13 वर्ष की ही थी। बास्केटबॉल उसका प्रिय खेल था।
कहती थी बाबा, आपने साथ दिया तो एक दिन में नेशनल टीम में खेलूंगी।, लेकिन 19 सितंबर की रात वह अपने ख्वाबों को भी साथ लेकर हमेशा- हमेशा के लिए चली गई।
आंखों में आंसू लिए अंकिता के पिता आनंद बस यही गुहार लगाते रहे, मेरी बेटी नहीं मरती, यदि उसे इलाज मिल जाता। इलाज तो नहीं मिला लेकिन अब उसे इंसाफ जरूर मिलना चाहिए।
अंकिता के पिता ने अपना यह दर्द बयां किया अमर उजाला संवाददाता के सामने।
सोनीपत के गांव बिलबिलावन निवासी आनंद ने कहा, दर्द से तड़पती अपनी फूल सी बच्ची को देखकर एक पिता क्या करता? धरती केभगवान से वही प्रार्थना मेरी पत्नी और मैं करते रहे।
पर वे नहीं पिघले और मेरी बच्ची तड़प-तड़प कर मर गई। वे डॉक्टर हैं, उनकेहाथ में रब ने जिंदगी बचाने का हुनर दिया है, लेकिन मेरी बेटी के लिए ही वह हुनर नहीं दिखा सके, बल्कि कठोर हो गए। मुझसे कहा... हटा इसे यहां से... यह मरेगी... इसे कैंसर है... आप ही बताइए एक पिता अपनी बेटी के लिए ऐसे शब्द सुन सकता है क्या? क्या एक मां का कलेजा नहीं फटेगा...?
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और क्या सजा देंगे...
आनंद भर्राई आवाज में कहते हैं, वह शब्द परिजन बर्दाश्त नहीं कर पाए। उठ गया हाथ धरती के भगवान पर। शीशा तोड़ने की सजा फांसी तो नहीं होगी न, लेकिन अस्पताल में मेरी बेटी की मौत लापरवाही से की गई हत्या है...। क्या मेरी बच्ची की मौत के जिम्मेदारों को सजा नहीं मिलनी चाहिए? हमारे खिलाफ तो कार्रवाई शुरू भी हो गई। मेरी अंकिता केमामा को पुलिस ने पकड़ भी लिया, जेल भी भेज दिया गया, मुझे और मेरी पत्नी के साथ भी ऐसा ही होगा शायद। कुछ देर रुक कर आनंद ने सवाल किया, लेकिन क्या यह न्याय होगा?
दूसरो को तो बचा लो...
आनंद ने हड़ताल कर रहे डॉक्टरों के लिए कहा, वे कुछ भी कर सकते हैं, उनके साथ पूरा प्रशासन हैं। लोगों को दर्द से छुटकारा देने की ताकत भी और मेरे जैसों को दर्द देने की हिम्मत भी। मैं अपनी बेटी का वास्ता इन डॉक्टरों को देता हूं, हड़ताल खत्म कर दो, पांच दिन में अंकिता के बाद कई लोग और इनकी जिद का शिकार हो चुके हैं। मेरी बेटी और उन लोगों को तो नहीं बचा पाए, लेकिन अब और लोगों की जिंदगी से मत खेलो, उन्हें तो इलाज दे दो, ताकि धरती के भगवान होने का रुतबा भी कायम रहे। बस मेरी एक ही इल्तजा है, मेरी बेटी को न्याय मिले और दोषी डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई हो, बाकी डॉक्टर काम करें और लोगों की जिंदगी बजाए, बस इतनी सी इच्छा है मेरी....।
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कहती थी बाबा, आपने साथ दिया तो एक दिन में नेशनल टीम में खेलूंगी।, लेकिन 19 सितंबर की रात वह अपने ख्वाबों को भी साथ लेकर हमेशा- हमेशा के लिए चली गई।
आंखों में आंसू लिए अंकिता के पिता आनंद बस यही गुहार लगाते रहे, मेरी बेटी नहीं मरती, यदि उसे इलाज मिल जाता। इलाज तो नहीं मिला लेकिन अब उसे इंसाफ जरूर मिलना चाहिए।
अंकिता के पिता ने अपना यह दर्द बयां किया अमर उजाला संवाददाता के सामने।
सोनीपत के गांव बिलबिलावन निवासी आनंद ने कहा, दर्द से तड़पती अपनी फूल सी बच्ची को देखकर एक पिता क्या करता? धरती केभगवान से वही प्रार्थना मेरी पत्नी और मैं करते रहे।
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पर वे नहीं पिघले और मेरी बच्ची तड़प-तड़प कर मर गई। वे डॉक्टर हैं, उनकेहाथ में रब ने जिंदगी बचाने का हुनर दिया है, लेकिन मेरी बेटी के लिए ही वह हुनर नहीं दिखा सके, बल्कि कठोर हो गए। मुझसे कहा... हटा इसे यहां से... यह मरेगी... इसे कैंसर है... आप ही बताइए एक पिता अपनी बेटी के लिए ऐसे शब्द सुन सकता है क्या? क्या एक मां का कलेजा नहीं फटेगा...?
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और क्या सजा देंगे...
आनंद भर्राई आवाज में कहते हैं, वह शब्द परिजन बर्दाश्त नहीं कर पाए। उठ गया हाथ धरती के भगवान पर। शीशा तोड़ने की सजा फांसी तो नहीं होगी न, लेकिन अस्पताल में मेरी बेटी की मौत लापरवाही से की गई हत्या है...। क्या मेरी बच्ची की मौत के जिम्मेदारों को सजा नहीं मिलनी चाहिए? हमारे खिलाफ तो कार्रवाई शुरू भी हो गई। मेरी अंकिता केमामा को पुलिस ने पकड़ भी लिया, जेल भी भेज दिया गया, मुझे और मेरी पत्नी के साथ भी ऐसा ही होगा शायद। कुछ देर रुक कर आनंद ने सवाल किया, लेकिन क्या यह न्याय होगा?
दूसरो को तो बचा लो...
आनंद ने हड़ताल कर रहे डॉक्टरों के लिए कहा, वे कुछ भी कर सकते हैं, उनके साथ पूरा प्रशासन हैं। लोगों को दर्द से छुटकारा देने की ताकत भी और मेरे जैसों को दर्द देने की हिम्मत भी। मैं अपनी बेटी का वास्ता इन डॉक्टरों को देता हूं, हड़ताल खत्म कर दो, पांच दिन में अंकिता के बाद कई लोग और इनकी जिद का शिकार हो चुके हैं। मेरी बेटी और उन लोगों को तो नहीं बचा पाए, लेकिन अब और लोगों की जिंदगी से मत खेलो, उन्हें तो इलाज दे दो, ताकि धरती के भगवान होने का रुतबा भी कायम रहे। बस मेरी एक ही इल्तजा है, मेरी बेटी को न्याय मिले और दोषी डॉक्टरों के खिलाफ कार्रवाई हो, बाकी डॉक्टर काम करें और लोगों की जिंदगी बजाए, बस इतनी सी इच्छा है मेरी....।