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बिखरता कुनबा

Tue, 25 Feb 2014 07:38 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Tue, 25 Feb 2014 07:38 PM IST
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Shattering kin

राजद में सेंध लगाने की सत्ताधारी जदयू की मंशा भले ही पूरी न हो पाई हो, लेकिन इससे लोकसभा चुनाव से पहले लालू यादव की पार्टी की आंतरिक कमजोरी जिस तरह सामने आई, वह ज्यादा देखने लायक है। लोजपा के भाजपा के साथ जाने की जो सुगबुगाहट है, वह भी कांग्रेस की तुलना में लालू यादव के लिए ज्यादा परेशान करने वाली बात है। हालांकि यह विद्रूप ही है कि राज्य की सत्ता में रहते हुए जो लालू यादव लगातार विरोधी दलों को तोड़ने के काम में लगे थे, आज वह अपने दल को तोड़ने की कोशिश को लोकतंत्र की हत्या बता रहे हैं, पर इसका मतलब यह नहीं कि जदयू के तौर-तरीके को जायज ठहरा दिया जाए।

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भाजपा द्वारा समर्थन वापस लेने के बाद से ही बहुमत से दूर हो गई नीतीश सरकार दूसरे दलों में विभाजन की कोशिशों में न सिर्फ लगी है, बल्कि मंत्रिमंडल में कई पद इसी उद्देश्य से खाली रखे गए हैं। पर विधानसभाध्यक्ष ने मौजूदा प्रसंग में जिस रवैये का परिचय दिया, वह तो खुलेआम पक्षपात है। अव्वल तो बाईस में से कथित तेरह विधायकों के अलग होने को स्वतंत्र गुट के तौर पर मान्यता नहीं दी जा सकती थी, क्योंकि वे दलबदल कानून के मुताबिक, मूल पार्टी के दो तिहाई नहीं थे। तिस पर विधानसभाध्यक्ष ने कथित रूप से अलग होने वाले विधायकों के दस्तखत जांचने की जहमत भी नहीं उठाई। लिहाजा इस घटनाक्रम से नीतीश कुमार और विधानसभाध्यक्ष, दोनों की छवि धूमिल हुई है, और अब तक हाशिये पर दिख रहे लालू को अचानक चर्चा में आने का मंच मिल गया है।
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इसके बावजूद चुनाव से पहले यह लालू की आश्वस्ति का कारण नहीं हो सकता। यह तथ्य है कि कांग्रेस के साथ लोकसभा चुनाव लड़ने के फैसले पर राजद के भीतर एकमत नहीं है। तिस पर लोजपा अगर सचमुच भाजपा के साथ चली जाती है, तो लालू के धर्मनिरपेक्ष गठबंधन को बड़ा झटका लगेगा। वैसे तो रामविलास पासवान की अवसरवादी राजनीति नई नहीं है, लेकिन लालू अगर लोजपा के साथ सीटों के बंटवारे पर शुरू में ही वर्चस्ववादी रवैया नहीं अख्तियार करते, तो उपेक्षित पासवान शायद अपना रास्ता बदलने के बारे में नहीं सोचते। लेकिन आखिरी वक्त में लोजपा अगर साथ आ जाए, जिसकी उम्मीद कम है, तो उसकी कीमत भी लालू को ही चुकानी होगी।

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