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आतंकवाद का साया
नई दिल्ली
Updated Sun, 22 Sep 2013 06:29 PM IST
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पश्चिम अफ्रीका में समृद्धि का प्रतीक माने जाने वाले केन्या की राजधानी नैरोबी में हुए आतंकी हमले के दृश्य हमारे समकालीन अतीत के ऐसे कायराना कृत्यों की प्रतिलिपियों जैसे ही हैं और बता रहे हैं कि आतंकवाद अपने जघन्यतम रूप में हमारे बीच अब भी फल-फूल रहा है।
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यह इसलिए भी खतरनाक है, क्योंकि सोमालिया के अल कायदा से संबद्ध आतंकी गुट अल शबाब के हमलावरों ने नैरोबी के शॉपिंग मॉल को निशाना बनाने से पहले वहां मौजूद लोगों की मजहब के आधार पर शिनाख्त की! क्या यह अल कायदा की नई रणनीति है?
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सच तो यह है कि न्यूयॉर्क के 9/11 के हमले के बाद दुनिया भर में आतंकवाद के खिलाफ छेड़ी गई मुहिम के एक दशक का वक्त बीत जाने के बावजूद कहीं कुछ नहीं बदला है। बेशक इस हमले के पीछे सोमालिया में मौजूद केन्याई सैनिकों का विरोध हो सकता है, लेकिन इस हमले में मारे गए पचास से अधिक लोगों में दो भारतीयों सहित कई देशों के लोग भी शामिल हैं।
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वाकई यह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि आखिर कैसे आतंकी महिलाओं और मासूम बच्चों तक को नहीं छोड़ते। मुंबई के ताज होटल पर हुए 26 /11 के हमले की तरह नैरोबी के मॉल में आतंकियों ने लोगों को बंधक बनाया और फिर अपने मंसूबों को अंजाम दिया।
जाहिर है, आतंकवाद किसी एक देश या किसी एक धर्म के लिए खतरा नहीं है, वह पूरी मानवता के लिए चुनौती बना हुआ है। पाकिस्तान के पेशावर में एक चर्च के बाहर हुआ हमला इसी बात की तस्दीक करता है, जहां पचास से अधिक लोग मारे गए हैं। हैरत की बात यह है कि आतंकवाद से जूझ रहे पाकिस्तान में नवाज शरीफ के आने के बाद भी हालात नहीं बदले हैं।
यह भी त्रासद ही है कि पूरी अंतरराष्ट्रीय बिरादरी आतंकियों के आगे बेबस नजर आ रही है। नैरोबी में हुआ हमला भारत के लिए खास चिंता का कारण होना चाहिए, क्योंकि इसने दिखाया कि दुनिया भर में आतंकवाद से जितना खतरा अमेरिकियों को है, उससे कम भारतीयों को नहीं है।
और फिर आज दुनिया का शायद ही कोई देश हो, जहां भारतीयों की पहुंच न हो। अकेले केन्या की बात करें, तो वहां 11,000 से अधिक भारतीय रहते हैं, इसलिए इस संकट के समय उनकी सुरक्षा का खास ध्यान रखने की जिम्मेदारी हमारी सरकार की होनी चाहिए।