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आतंक का साया

Thu, 01 May 2014 07:59 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Thu, 01 May 2014 07:59 PM IST
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shadow of terror

बंगलूरू से गुवाहाटी जा रही ट्रेन में चेन्नई रेलवे स्टेशन पर हुए धमाके भले ही कम तीव्रता के थे, मगर ये धमाके यह बताने के लिए काफी हैं कि चाहे लाख दावे किए जाएं, आम आदमी की सुरक्षा में काफी खामियां हैं। इसके पीछे चाहे जो भी संगठन या लोग जिम्मेदार हों, उनका मकसद आम लोगों में दहशत फैलाना था। वास्तव में आंतरिक सुरक्षा के मोर्चे पर हमारी सुरक्षा और खुफिया एजेंसियों की खामियां एक बार फिर उजागर हुई हैं, जिसके कारण एक युवती की मौत हो गई और अनेक लोग घायल हो गए।

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भारतीय जनता पार्टी इन धमाकों को पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की सुरक्षा से जोड़कर देख रही है, क्योंकि दो घंटे देर से चल रही इस ट्रेन को चेन्नई के बाद आंध्र प्रदेश के सीमांध्र वाले हिस्से से गुजरना था, जहां उनकी रैली प्रस्तावित थी। उल्लेखनीय है कि दक्षिण भारत में अब सिर्फ इसी हिस्से में चुनाव रह गए हैं, इसलिए संभव है कि दहशतगर्दों के निशाने पर सीमांध्र रहा हो। यह भी तो हो सकता है कि इन धमाकों के पीछे ऐसे लोग हों, जो आंध्र प्रदेश के विभाजन के खिलाफ हैं।
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मगर कुल मिलाकर ये धमाके आतंकवाद के खिलाफ हमारी तैयारियों और आंतरिक सुरक्षा को लेकर बड़ा सवाल खड़ा करते हैं। ऐसे समय जब देश में आम चुनाव हो रहे हैं और जब सुरक्षा के अतिरिक्त इंतजाम के साथ ही काफी सतर्कता बरती जा रही है, ऐसा कैसे हो गया कि देश के एक बड़े भीड़भाड़ वाले रेलवे स्टेशन में खड़ी एक ट्रेन के दो डिब्बों में कुछ लोग धमाका करने में कामयाब हो गए?
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यह विडंबना ही है कि इन धमाकों के बाद एक बार फिर आतंकवाद से निपटने के तौर-तरीकों को लेकर राजनीति शुरू हो गई है। तमिलनाडु की मुख्यमंत्री जयललिता ने धमाके की जांच में केंद्र से किसी भी तरह की मदद लेने से इन्कार कर प्रदेश की कानून-व्यवस्था में केंद्र के दखल के पुराने मुद्दे को ही छेड़ने की कोशिश की है। दूसरी ओर वित्त मंत्री पी चिदंबरम एक बार फिर राष्ट्रीय आतंकवाद विरोधी केंद्र की स्थापना पर जोर दे रहे हैं। यह समझने की जरूरत है कि आतंकवाद किसी एक राज्य से जुड़ा मुद्दा नहीं है, इसकी जद में सारा देश है और इससे निपटने के लिए दलीय राजनीति से ऊपर उठकर केंद्र तथा राज्य सरकारों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत है।

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