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पिंजरे का तोता
Updated Wed, 08 May 2013 10:41 PM IST
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कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजे से यदि कुछ भी निष्कर्ष निकाला जा सकता है, तो वह यह कि भ्रष्टाचार कोई निरपेक्ष मुद्दा नहीं है।
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सात वर्ष बाद प्रदेश में वापसी करने वाली कांग्रेस से बेहतर इसे भला कौन जान सकता है? वास्तव में कोलगेट मामले में सुनवाई के दौरान सर्वोच्च अदालत ने यूपीए सरकार को जिस तरह आड़े हाथ लिया, उससे कर्नाटक में कांग्रेस को मिली जीत का रंग फीका हो गया है।
सर्वोच्च न्यायालय ने कोयला घोटाले से संबंधित सीबीआई की स्टेटस रिपोर्ट में कानून मंत्री, प्रधानमंत्री कार्यालय तथा कोयला मंत्रालय के अधिकारियों द्वारा किए गए फेरबदल पर जिस तरह सख्त ऐतराज जताया है, वह भ्रष्टाचार के मुद्दे पर यूपीए सरकार की नीयत को ही उजागर करता है।
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शीर्ष अदालत द्वारा सीबीआई को पिंजरे का तोता बताए जाने के बाद तो कोई संदेह ही नहीं रह गया है कि सरकार शीर्ष जांच एजेंसी का इस्तेमाल खुद के बचाव के लिए करती है। सवाल यह है कि क्या यह सब सिर्फ कानून मंत्री अश्विनी कुमार के कहने पर हो रहा था या उसके पीछे सरकार में शीर्ष स्तर पर कोई सहमति थी?
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आखिर प्रधानमंत्री कार्यालय और कोयला मंत्रालय के अधिकारी किसके कहने पर सीबीआई के काम में दखल दे रहे थे? हैरत की बात है कि इन टिप्पणियों के बावजूद कांग्रेस अपने मंत्री का बचाव कर रही है, जबकि सर्वोच्च अदालत ने साफ कहा है कि सीबीआई को किसी को रिपोर्ट दिखाने की जरूरत ही नहीं है।
जाहिर है, शीर्ष अदालत ने जो कुछ कहा है, उसके बाद भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार की ओर से कहने को कुछ बचता ही नहीं है। यदि वह भ्रष्टाचार के मुद्दे पर गंभीर है, तो उसे सबसे पहले शीर्ष जांच एजेंसी को अपनी पकड़ से बाहर करना चाहिए।
कोयला घोटाले पर सरकार को घेरने वाली भाजपा को भी यह स्वीकार करना चाहिए कि दक्षिण का उसका एकमात्र किला यदि ढह गया है, तो इसलिए क्योंकि उसने भी पहले रेड्डी बंधुओं के भ्रष्टाचार को ढकने की कोशिश की, और फिर लोकायुक्त की रिपोर्ट आने से पहले तक येदियुरप्पा के हाथों में खेलती रही।
यदि भ्रष्टाचार के कारण कर्नाटक में भाजपा हारी है, तो यह क्यों नहीं माना जाना चाहिए कि यही मुद्दा कल आम चुनाव में यूपीए के लिए भी भारी पड़ सकता है?