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मुस्लिमों की याद आई
नई दिल्ली
Updated Wed, 26 Feb 2014 07:18 PM IST
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दस वर्षों से केंद्र की सत्ता से बाहर भारतीय जनता पार्टी को लगता है कि अभी सियासी माहौल उसके पक्ष में है और यदि उसने ठीक रणनीति अपनाई, तो लोकसभा चुनाव के बाद वह सत्ता में लौट सकती है। पार्टी के अल्पसंख्यक कार्यकर्ताओं के सम्मेलन में भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह की मुस्लिमों से की गई अपील को इसी रणनीति का हिस्सा मानना चाहिए और उनके बयान को मुस्लिमों के प्रति पार्टी के रुख में किसी बड़े बदलाव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
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खुद राजनाथ सिंह ने स्पष्ट किया है, 'मैंने जो कुछ कहा, वह बहुत स्पष्ट है कि एक पार्टी के रूप में हम ऐसी राजनीति में नहीं उलझते, जिससे सामाजिक सौहार्द बिगड़े, लेकिन अगर अनजाने में भी हमसे भूल हो गई हो, तो उसके लिए हम खेद भी व्यक्त कर सकते हैं।'
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असल में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की राह में सबसे बड़ा रोड़ा उनकी अपनी छवि ही है, जिससे वह उबर नहीं पा रहे हैं। 2002 के गुजरात दंगों को लेकर पार्टी चाहे लाख सफाई दे, वह मुस्लिमों का विश्वास जीत नहीं सकी है। उन दंगों को भाजपा 1984 के सिख विरोधी दंगे से कमतर बताकर अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकती। दरअसल राजनाथ सिंह जानते हैं कि देश की आबादी में 14 फीसदी से अधिक की हिस्सेदारी करने वाले मुस्लिमों की उपेक्षा कर भाजपा अपने मिशन 272 की ओर आगे नहीं बढ़ सकती।
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अनुमान के मुताबिक, करीब 220 लोकसभा सीटों पर मुस्लिमों की आबादी 10 फीसदी से अधिक है, वहीं इनमें से 70 सीटें ऐसी हैं, जिनमें उनकी हिस्सेदारी 20 फीसदी से भी अधिक है। यही नहीं, हिंदी पट्टी के दो बड़े सूबे उत्तर प्रदेश और बिहार में लोकसभा की 120 सीटें हैं और वहां भी ढाई दर्जन सीटों पर मुस्लिम निर्णायक साबित हो सकते हैं।
बेशक, कांग्रेस सहित तमाम पार्टियों ने मुस्लिम तुष्टीकरण की आड़ में इस तबके को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल किया है, मगर भाजपा भी उसी राह पर चलना चाहती है। जाहिर है, भाजपा को मुस्लिमों का विश्वास जीतने के लिए अपना दिल जरा बड़ा करना पड़ेगा और सच्चर कमेटी के इस निष्कर्ष को स्वीकार करना पड़ेगा कि मुस्लिम देश का सबसे गरीब, अशिक्षित और उपेक्षित तबका है। यही नहीं, मौजूदा लोकसभा में उनका प्रतिनिधित्व सिर्फ छह फीसदी है!