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अब हॉकी की मंडी
नई दिल्ली
Updated Mon, 17 Dec 2012 10:42 PM IST
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अपनी पुरानी पहचान को तरस रही भारतीय हॉकी को हॉकी इंडिया लीग (एचआईएल) से किसी तरह का फायदा हो या न हो, मगर इसकी शुरुआत हमारे इस पारंपरिक खेल में आ रहे एक बड़े बदलाव का संकेत जरूर है। अतीत में ओलंपिक में मिले आठ स्वर्ण पदकों और इक्का-दुक्का उपलब्धियों के अलावा हॉकी में हमारे पास बताने को कुछ खास नहीं है। यों तो हॉकी को राष्ट्रीय खेल माना जाता है, मगर उसके साथ खेल ही हो रहा है।
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ऐसा लगता है कि क्रिकेट और टेनिस जैसे खेलों के मुकाबले उसे दोयम दर्जा हासिल है। हॉकी खिलाड़ियों को न तो क्रिकेटरों और टेनिस खिलाड़ियों जैसी सुविधाएं मिलती हैं और न ही पैसा। ऐसे में एचआईएल में सबसे ज्यादा कीमत हासिल करने वाले सितारा खिलाड़ी सरदार सिंह और रघुनाथ ने खुद पर लगी बोली को लेकर आश्चर्य जताया, तो हैरत नहीं हुई।
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मगर इन दोनों की कीमतों का जोड़ एक करोड़ रुपये से भी कम है! यह आईपीएल के निचले क्रम के खिलाड़ियों को मिलने वाली रकम से भी कम है। हमारे देश में हॉकी की तुलना क्रिकेट से नहीं की जा सकती, पर एचआईएल की शुरुआत से बाजार की ताकत का अंदाजा लगाया जा सकता है। वास्तव में क्रिकेट को लोकप्रिय बनाने में बाजार की बड़ी भूमिका है, जिसने बीसीसीआई तक को मालामाल कर रखा है।
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बेशक एचआईएल के पांचों फ्रैंचाइजी ने खिलाड़ियों की बोली लगाने में दिलचस्पी दिखाई है, लेकिन इसकी असली परीक्षा तो जनवरी में होगी, जब इसके मुकाबले शुरू होंगे। खेलों को पेशेवराना बनाने का यह प्रयास नया नहीं है। यूरोप और अमेरिका में तो फुटबाल और बास्केटबाल में इस तरह की लीग काफी लोकप्रिय हैं, लेकिन वहां हमारे यहां की तरह बाजार हावी नहीं है।
लाख टके का सवाल है कि क्या एचआईएल भारतीय हॉकी का किसी तरह का भला कर पाएगी? आईपीएल में बड़े कॉरपोरेट घरानों और बॉलीवुड के आने से पैसा तो बहुत आया, मगर दावे से नहीं कहा जा सकता कि उससे भारतीय क्रिकेट को खास लाभ हुआ हो। खेल का बाजार बढ़ रहा है, मगर जब बाजार ही खेल में घुस जाए, तब मुश्किल शुरू होने लगती है। यह विडंबना ही है कि खेलों के साथ सरकार भी खिलवाड़ करने से गुरेज नहीं करती।