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संस्कृत आयोग
अमर उजाला दिल्ली
Updated Mon, 06 Jan 2014 07:00 PM IST
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केंद्र सरकार ने संस्कृत भाषा के विकास एवं प्रचार-प्रसार के लिए दूसरे संस्कृत आयोग के गठन की घोषणा की है। 13 सदस्यीय इस आयोग का प्रमुख ख्यातिलब्ध संस्कृत विद्वान सत्यव्रत शास्त्री को बनाया गया है।
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संस्कृत शिक्षा की मौजूदा स्थिति का पता लगाने एवं इसे आधुनिक शिक्षा प्रणाली से जोड़ने के उद्देश्य से ही इस आयोग का गठन किया गया है। गौरतलब है कि इससे पहले 1956 में डॉ सुनीति कुमार चटर्जी के नेतृत्व में पहले संस्कृत आयोग का गठन किया गया था, जिसने कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे।
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पहले संस्कृत आयोग के सुझाव के आधार पर ही केंद्र सरकार ने संस्कृत के प्रचार-प्रसार एवं केंद्र सरकार की संस्कृत संबंधी नीतियों एवं कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए 15 अक्तूबर, 1970 को एक स्वायत्त संगठन के रूप में राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान की स्थापना की थी।
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राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान को सात मई, 2002 को सरकार ने बहुपरिसरीय विश्ववद्यालय का दर्जा दे दिया है। भारतीय भाषाओं की जननी संस्कृत भाषा की दुर्दशा का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 2001 की जनगणना में करीब चौदह हजार लोगों ने ही स्वयं को संस्कृतभाषी बताया था।
बेशक संस्कृत आठवीं अनुसूची में शामिल है, लेकिन उत्तराखंड में ही इसे दूसरी आधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त है। शायद संस्कृत की ऐसी ही स्थिति को देखते हुए दूसरे संस्कृत आयोग के गठन की जरूरत महसूस की गई।
दूसरा संस्कृत आयोग स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों एवं अन्य संस्थानों में संस्कृत शिक्षा की सुविधाओं के बारे में एक सर्वे करेगा और संस्कृत शिक्षा एवं शोध को बढ़ावा देने के लिए उपाय सुझाएगा। साथ ही यह राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान को एक राष्ट्रीय स्तर का संस्थान बनाने के लिए भी रूपरेखा तैयार करेगा।