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गिरते रुपये को थामने की चुनौती
नई दिल्ली
Updated Tue, 16 Jul 2013 09:03 PM IST
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अर्थव्यवस्था को गति देने और गिरते रुपये को तत्काल थामने के लिए समेकित प्रयास की जरूरत है, लेकिन मनमोहन सिंह सरकार ने मौद्रिक कवायद को ही आखिरी उपाय मान लिया है! वित्त मंत्री से मुलाकात के बाद रिजर्व बैंक के मुखिया ने मुद्रा बाजार को कसने से जुड़े जो हालिया फैसले लिए, वह इसी का सुबूत है, लेकिन इससे स्थिति सुधरने की उम्मीद तो दूर, उठता शेयर बाजार भी थोड़ा गिर गया।
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रिजर्व बैंक का कदम गलत नहीं है; अगर रुपये की कमजोरी के पीछे विदेशी मुद्रा बाजार में अत्यधिक उठा-पटक और सट्टेबाजी का भी हाथ है, तो फौरी नकद ऋण की ब्याज दर बढ़ाने और एक दिन की उधारी सीमा सीमित कर देने से उन निजी और विदेशी बैंकों के खेल को कमोबेश रोका जा सकेगा, जिन पर सट्टेबाजी को बढ़ावा देने का संदेह है। पर केंद्रीय बैंक के इस कदम से उद्योग-व्यापार हतोत्साहित ही ज्यादा होगा।
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शेयर बाजार गिरेगा, तो विदेशी संस्थागत निवेश की उम्मीद भी कैसे करेंगे? इससे उद्यमियों में जो संदेश गया है, वह तो और खतरनाक है, कि तिमाही आर्थिक समीक्षा के दौरान केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है। बाजार में रुपये की कमी पैदा कर या बांड बेचकर विदेशी मुद्रा हासिल करके रुपये की फिसलन को तो थोड़ा-बहुत रोका जा सकता है, पर उससे अर्थव्यवस्था को गति मिलने की गारंटी नहीं है।
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सरकार के रवैये से साफ है कि वह अर्थव्यवस्था को गति देने के दीर्घावधि लक्ष्य की अनदेखी करते हुए किसी भी तरह रुपये को ऊपर उठाने की कोशिश में लगी है, जिसकी सफलता की गारंटी नहीं है। लंबे समय से कई उद्योग संगठन आपूर्ति पक्ष सुधारने और कृषि क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश करने का सुझाव दे रहे हैं और खुद उद्योग जगत ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद लिए बैठा है। हालांकि अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए पिछले दिनों कई फैसले लिए गए और अब खुद प्रधानमंत्री ने कई योजनाओं की शुरुआत का संकेत दिया है।
लेकिन इन योजनाओं का लाभ अभी तक सामने आया नहीं है, जबकि अफरातफरी में उठी मौद्रिक कवायदों का नुकसान दिखने लगता है। विद्रूप देखिए कि इसके बावजूद वित्त मंत्री छह फीसदी की विकास दर का भरोसा दिला रहे हैं।