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सचिन का सही फैसला
नई दिल्ली
Updated Thu, 10 Oct 2013 07:23 PM IST
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यह फैसला सचिन तेंदुलकर के लिए बहुत कठिन रहा होगा, लेकिन अंततः क्रिकेट से संन्यास लेने का फैसला उन्हें ही करना था। नवंबर में मुंबई में वेस्ट इंडीज के खिलाफ अपना दो सौवां टेस्ट खेलने के बाद वह क्रिकेट के सभी फॉर्म से अलग हो जाएंगे। वन डे से उन्होंने पहले ही संन्यास ले लिया है, और एक दिन पहले उन्होंने ट्वंटी-20 को भी अलविदा कह दिया।
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क्रिकेट के मैदान से उनकी विदाई एक ऐसे अध्याय के अंत जैसी होगी, जिसकी पुनरावृत्ति में शायद दशकों लग जाएं। तकरीबन एक चौथाई सदी लंबे करियर में सचिन ने क्रिकेट के तकरीबन सारे शिखर छू लिए हैं। 1989 में 16 बरस की उम्र में जब उन्हें पहली बार भारतीय टीम में शामिल किया गया था, तब आज की टीम में शामिल कई युवा खिलाड़ियों का शायद जन्म भी न हुआ रहा हो!
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क्रिकेट ने उन्हें जितना दिया, उससे कम उनका योगदान इस खेल को नहीं है। यह ऐसे ही नहीं है, कि डिकी बर्ड जैसे महान अंपायर तक उन्हें सर डॉन ब्रैडमैन के बाद महान बल्लेबाज मानते हैं। ब्रैडमैन और सचिन के समय में अंतर है, मगर ब्रायन लारा या रिकी पोंटिंग जैसे अपने समकालीनों की तुलना में वह बीस ही बैठते हैं।
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यह सचिन की विनम्रता ही है कि उन्होंने कभी इस तरह की तुलना को तवज्जो नहीं दी। शुरुआती दिनों में ओपनर और बाद में मध्यक्रम के बल्लेबाज के रूप में उन्होंने जो मील के पत्थर गाड़े हैं, उन्हें पार करना अच्छे-अच्छों के बूते का नहीं है। उन्हें इसलिए भी याद किया जाएगा, क्योंकि उन्होंने 1990 के उत्तरार्ध के बाद अगले दशक में सौरव गांगुली, राहुल द्रविड़ और वीवीएस लक्ष्मण के साथ बल्लेबाजी का कलेवर ही बदल दिया, जिसके दम पर भारतीय क्रिकेट टीम बुलंदियों को छू सकी।
यह ज्यादती ही होगी कि उनसे हमेशा अच्छा खेलने की अपेक्षा की जाए, मगर जिस देश में उन्हें 'भगवान' जैसा दर्जा दिया गया हो, वहां उनकी नाकामियों पर प्रशंसकों की मायूसी और आलोचकों की नाराजगी स्वाभाविक ही है। असल में पिछले दो वर्षों में सचिन लगता है, कहीं चुक रहे थे, उनका औसत उनके पूरे करियर के 53.9 से घटकर 31.1 ही रह गया, उन्होंने आखिरी सैकड़ा भी 21 टेस्ट मैचों के अंतर से लगाया था। ऐसे में उनका यह कदम उचित ही लगता है, जिसका सम्मान किया जाना चाहिए।