{"_id":"5dc95343312fd1b280526cbedda1999b","slug":"return-of-amma-hindi","type":"story","status":"publish","title_hn":"अम्मा की वापसी","category":{"title":"Other Archives","title_hn":"अन्य आर्काइव","slug":"other-archives"}}
अम्मा की वापसी
अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Mon, 11 May 2015 07:43 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
फिल्मों से राजनीति में आईं अन्नाद्रमुक सुप्रीमो जे जयललिता का राजनीतिक जीवन भी फिल्मी नाटकीयता से परिपूर्ण है, जिसे आय से अधिक संपत्ति से जुड़े उनके मामले में आए कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले की रोशनी में देखा जा सकता है। इस मामले में बरी की गईं जयललिता का पांचवीं बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनना अब सिर्फ औपचारिकता है। मुख्यमंत्री के रूप में उनके पहले कार्यकाल से जुड़े इस 18 वर्ष पुराने मामले के कारण उनका सियासी जीवन ही दांव पर लगा हुआ था।
विज्ञापन
हालांकि अभियोजन के पास उच्च न्यायालय के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने का अवसर है, पर इस फैसले ने तमिलनाडु की राजनीति को उलट-पुलट दिया है। पिछले वर्ष सितंबर में जब विशेष अदालत ने जयललिता और उनकी मित्र शशिकला सहित चार लोगों को आय से अधिक संपत्ति के मामले में दोषी ठहराया था, तब जयललिता को मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा था। उनकी जगह पन्नीरसेलवम ने राज्य की कमान संभाली जरूर, मगर उनकी सरकार ने इन आठ महीनों में कोई बड़ा फैसला नहीं लिया। उल्टे चेन्नई मेट्रो के प्रथम चरण का उद्घाटन और ग्लोबल इन्वेस्टमेंट समिट को जयललिता से जुड़े मामले के फैसले आने तक टाल दिया गया था।
विज्ञापन
इससे पहले सितंबर, 2001 में भी जब जमीन से जुड़े भ्रष्टाचार के मामले में जयललिता को मुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा था, तब पन्नीरसेलवम ने ही उनकी कुर्सी संभाली थी। पर अदालत के फैसले का मतलब अन्नाद्रमुक की अंदरूनी राजनीति से इतर भी है।
विज्ञापन
वास्तव में यह फैसला द्रमुक के लिए करारा झटका है, जो लोकसभा चुनाव में मिली पराजय से आज तक उबर नहीं पाया है। जयललिता की वापसी का असर केंद्रीय राजनीति पर भी पड़ सकता है, क्योंकि लोकसभा में 37 सीटों के साथ अन्नाद्रमुक भाजपा और कांग्रेस के बाद तीसरी सबसे बड़ी पार्टी है।
फैसले के बाद तमिलनाडु में जिस तरह का जश्न मनाया जा रहा है, उससे जयललिता की लोकप्रियता का अंदाजा लगाया जा सकता है। अभी यह देखना वाकई दिलचस्प होगा कि क्या इस मौके का फायदा उठाते हुए जयललिता 2016 में प्रस्तावित विधानसभा चुनाव को समय से पहले कराने का राजनीतिक दांव तो नहीं चलेंगी!