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लोकतंत्र की छटपटाहट

Wed, 01 Oct 2014 08:27 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Wed, 01 Oct 2014 08:27 PM IST
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Restlessness of democracy

लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर हांगकांग में हो रहे प्रदर्शनों ने चीन की दमनकारी नीतियों को एक बार फिर से उजागर कर दिया है। ये प्रदर्शन चीन द्वारा थोपी गई उस व्यवस्था के खिलाफ हो रहे हैं, जिसमें वहां के लोगों को अपना प्रतिनिधि तक चुनने का अधिकार नहीं है।

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यह सब तब हो रहा है, जब खुद चीन ने 1997 में हांगकांग के ब्रिटेन से हुए हस्तांतरण के समय 'एक राष्ट्र, दो व्यवस्था' की नीति पर अमल का वायदा किया था, यानी चीन के भीतर रहते हुए भी हांगकांग को पर्याप्त स्वायत्तता दी जानी थी। यह व्यवस्था 50 वर्षों के लिए यानी 2047 तक के लिए की गई थी। वास्तव में हांगकांग को विदेश और रक्षा मामलों को छोड़कर विधि सहित अन्य मामलों में अपनी नीतियां बनाने के साथ ही नागरिक स्वतंत्रता देने का वायदा चीन ने किया था।
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लेकिन हकीकत यह है कि वहां के बाशिंदों को प्रत्यक्ष तौर पर अपने नेता तक के चुनाव का अधिकार नहीं दिया गया है। चीन की कम्युनिस्ट सरकार की पसंद से 1,200 सदस्यीय चुनाव समिति का गठन किया जाता है, और वही उन उम्मीदवारों में से अपना प्रतिनिधि चुनते हैं, जिनके नाम पर बीजिंग की सहमति होती है!
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प्रदर्शनकारी मौजूदा मुख्य कार्यकारी लियुंग चुनयिंग के इस्तीफे और 2017 के चुनाव से पहले चुनाव सुधार की मांग कर रहे हैं। असल में समझौते के तहत चीन ने 2017 में हांगकांग में स्वतंत्र चुनाव कराने का वायदा भी किया था, लेकिन बाद में चीनी सरकार इससे मुकर गई। यह आंदोलन इसी वर्ष अप्रैल में ऑक्यूपाई सेंट्रल नामक संगठन द्वारा आयोजित उस गैरसरकारी रायशुमारी की पृष्ठभूमि में शुरू हुआ, जिसमें लोगों ने राजनीतिक सुधारों का समर्थन किया था। हालांकि अब यह आंदोलन किसी एक संगठन के नियंत्रण में नहीं है और हालत यह है कि चीन के पैंसठवें राष्ट्रीय दिवस के मौके पर भी हांगकांग में प्रदर्शनकारी डटे रहे।


दूसरी ओर, चीनी सरकार इस प्रदर्शन को दबाने में कोई कसर नहीं छोड़ रही है। खुली बाजार व्यवस्था के कारण हांगकांग ने समृद्धि हासिल की है और दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा है, लेकिन नागरिक स्वतंत्रता वहां एक बड़ा मसला है। लोकतंत्र समर्थकों को यह भय सता रहा है कि चीन देर-सबेर हांगकांग पर अपनी पकड़ और मजबूत कर लेगा और तब 'एक राष्ट्र दो व्यवस्था' की नीति पूरी तरह से बेमानी हो जाएगी।

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