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आरक्षण की राजनीति
नई दिल्ली
Updated Tue, 17 Mar 2015 07:23 PM IST
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सर्वोच्च न्यायालय ने देश के नौ राज्यों में केंद्रीय सेवा में जाट समुदाय को दिए गए आरक्षण को रद्द कर आरक्षण की व्यवस्था की विसंगतियों को एक बार फिर उजागर किया है। हालांकि केंद्र सरकार ने फैसले को शीर्ष अदालत की बड़ी बेंच में चुनौती देने की बात की है, पर इस फैसले ने जाट आरक्षण के पीछे की राजनीति को भी सामने ला दिया है।
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यूपीए सरकार ने लोकसभा चुनाव की अधिसूचना जारी होने से ठीक एक दिन पहले पिछले वर्ष चार मार्च को जाट समुदाय को अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी के तहत आरक्षण देने की घोषणा कर उसे लुभाने की कोशिश की थी। हालांकि जिन नौ राज्यों में जाट आरक्षण की व्यवस्था की गई थी, वहां कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा। यहां तक कि जाट आरक्षण का श्रेय लेने वाले अजित सिंह तक चुनाव हार गए थे!
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इसके बावजूद एनडीए सरकार ने भी जाट आरक्षण को रद्द करने का साहस नहीं दिखाया, बल्कि उसने राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग की जाट आरक्षण से असहमति जताने वाली सिफारिश को खारिज कर एक विशेषज्ञ समिति की सिफारिश पर भरोसा किया। संभवतः इसकी बड़ी वजह यह है कि जाट समुदाय राजनीतिक रूप से काफी मुखर और संगठित है, लिहाजा राजनीतिक वर्ग उसे नाराज नहीं करना चाहता।
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यह विडंबना ही है कि निचले और वंचित तबकों को बराबरी पर लाने के उद्देश्य से आरक्षण की व्यवस्था की गई थी, लेकिन पिछले पैंसठ वर्षों में यह व्यवस्था राजनीतिक तुष्टीकरण का जरिया बन गई। सर्वोच्च अदालत ने फैसले में कहा है कि जाति पिछड़ेपन का एक प्रमुख कारक हो सकती है, लेकिन यही एकमात्र कारक नहीं हो सकती। हालांकि इस पर भी बहस की गुंजाइश है, क्योंकि जातिगत रूप से विभाजित भारतीय समाज में आज भी अनेक जातियां हाशिये पर हैं।
इसके साथ ही एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि जिस समुदाय को केंद्रीय नौकरियों और उच्च शिक्षा में ओबीसी के तहत आरक्षण के योग्य नहीं माना जा रहा है, वह राज्य की नौकरियों के लिए पिछड़ेपन के आधार पर आरक्षण का पात्र कैसे हो सकता है! दरअसल आरक्षण के शार्ट कट के बजाय यह सोचने का वक्त आ गया है कि सामाजिक आर्थिक रूप से वंचित तबकों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए आत्मनिर्भर कैसे बनाया जाए।