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रिसर्च में रोड़ा बना एमडीयू प्रशासन
अमर उजाला ब्यूरो/ रोहतक
Updated Mon, 29 Sep 2014 09:12 AM IST
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रिसर्च को बढ़ावा देने के दावे एमडीयू प्रशासन ने कई बार किया है।
लेकिन अब वह अपने यहां चल रहे रिसर्च वर्क में खुद ही रोड़ा डाल रहा है। यूजीसी से मंजूरी और अनुदान प्राप्त इस रिसर्च प्रोजेक्ट के लिए एमडीयू के शिक्षक को आरटीआई तक का सहारा लेना पड़ रहा है।
एमडीयू के बायोटेक विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. वीरभान को यूजीसी ने मेजर प्रोजेक्ट दिया है। इसके तहत वे मक्खियों की ड्रोसोफिला प्रजाति के जीन्स पर फंगस के असर पर रिसर्च कर रहे हैं।
यूजीसी ने उन्हें इसके लिए 9.28 लाख रुपये का अनुदान दिया है। यूजीसी से मिली इस राशि से असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. वीरभान को एक एसी खरीदने तक की मंजूरी नहीं दी जा रही है। यह एसी वे रिसर्च में प्रयोग मक्खियों को एक निश्चित तापमान में रखने के लिए खरीदना चाहते हैं। इसके अभाव में कई मक्खियां, जिन पर रिसर्च किया गया, मर गईं। डॉ. वीरभान का आरोप है कि कई बार यूनिवर्सिटी प्रशासन को एसी खरीदने के लिए पत्र लिखा गया, लेकिन मंजूरी नहीं मिली।
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जवाब मिला, क्या जरूरत है एसी की
डॉ. वीरभान बताया कि सबसे पहले यूआईईटी के निदेशक को इस संबंध में पत्र लिखा था। उन्होंने कोऑर्डिनेटर को पत्र लिखने को कहा। यहां से सही जवाब नहीं मिला तो कुलपति एचएस चहल के पास फाइल भेजी गई। उन्होंने यूआईईटी निदेशक के नाम फाइल पर नोट लगा दिया। काफी समय बाद इंजीनियरिंग सेल में एसडीई राजेश गुलिया ने लैब का दौरा किया, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। जब भी इंजीनियरिंग सेल में गए, उन्हें जवाब मिला कि रिसर्च में एसी की जरूरत कहां हैं।
मक्खियों को फिर लाने में लगता है समय
डॉ. वीरभान ने बताया कि सभी प्रयास करने के बाद आरटीआई आरटीआई लगाई है। लेकिन इससे भी कहीं से अभी तक सही जवाब नहीं मिला है। एसी नहीं होने से मक्खियों को एक निश्चित तापमान में रखने में दिक्कतें आ रही हैं। कई मक्खियां मर गईं। ऐसे में उन्हें फिर लाने में वक्त लगता है, क्योंकि रोहतक के अलावा कलानौर, हिसार, पानीपत आदि जगहों से इन मक्खियों को पकड़ना पड़ता है।
22 डिग्री में रखना होता है मक्खियों को
इस रिसर्च पर दो साल से काम कर रहे डॉ. वीरभान ने बताया कि ड्रोसोफिला का जीवन चक्र दो माह का ही होता है। इन्हें 22 डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान पर रखना होता है। इससे बहुत ज्यादा या काफी कम तापमान पर इनका जिंदा रहना मुश्किल होता है।
बड़ी लैब में एक एसी से नहीं होगा फायदा
लैब का निरीक्षण करने वाले इंजीनियरिंग सेल के एसडीई (इलेक्ट्रिकल) राजेश गुलिया ने बताया कि एसी की मंजूरी कुलपति द्वारा दी जाती है। लैब का निरीक्षण किया था, लेकिन लैब काफी बड़ी है। इसमें एक एसी लगने से उसका कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा। यदि लैब का पार्टेशन हो, तो संभव है। आरटीआई का जवाब दे दिया गया है। एसी के लिए सेल से अप्रूवल भी भेजी जा चुकी है। कुलपति की मंजूरी मिलते ही एसी लगा दिया जाएगा।
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लेकिन अब वह अपने यहां चल रहे रिसर्च वर्क में खुद ही रोड़ा डाल रहा है। यूजीसी से मंजूरी और अनुदान प्राप्त इस रिसर्च प्रोजेक्ट के लिए एमडीयू के शिक्षक को आरटीआई तक का सहारा लेना पड़ रहा है।
एमडीयू के बायोटेक विभाग में असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. वीरभान को यूजीसी ने मेजर प्रोजेक्ट दिया है। इसके तहत वे मक्खियों की ड्रोसोफिला प्रजाति के जीन्स पर फंगस के असर पर रिसर्च कर रहे हैं।
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यूजीसी ने उन्हें इसके लिए 9.28 लाख रुपये का अनुदान दिया है। यूजीसी से मिली इस राशि से असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. वीरभान को एक एसी खरीदने तक की मंजूरी नहीं दी जा रही है। यह एसी वे रिसर्च में प्रयोग मक्खियों को एक निश्चित तापमान में रखने के लिए खरीदना चाहते हैं। इसके अभाव में कई मक्खियां, जिन पर रिसर्च किया गया, मर गईं। डॉ. वीरभान का आरोप है कि कई बार यूनिवर्सिटी प्रशासन को एसी खरीदने के लिए पत्र लिखा गया, लेकिन मंजूरी नहीं मिली।
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जवाब मिला, क्या जरूरत है एसी की
डॉ. वीरभान बताया कि सबसे पहले यूआईईटी के निदेशक को इस संबंध में पत्र लिखा था। उन्होंने कोऑर्डिनेटर को पत्र लिखने को कहा। यहां से सही जवाब नहीं मिला तो कुलपति एचएस चहल के पास फाइल भेजी गई। उन्होंने यूआईईटी निदेशक के नाम फाइल पर नोट लगा दिया। काफी समय बाद इंजीनियरिंग सेल में एसडीई राजेश गुलिया ने लैब का दौरा किया, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं हुआ। जब भी इंजीनियरिंग सेल में गए, उन्हें जवाब मिला कि रिसर्च में एसी की जरूरत कहां हैं।
मक्खियों को फिर लाने में लगता है समय
डॉ. वीरभान ने बताया कि सभी प्रयास करने के बाद आरटीआई आरटीआई लगाई है। लेकिन इससे भी कहीं से अभी तक सही जवाब नहीं मिला है। एसी नहीं होने से मक्खियों को एक निश्चित तापमान में रखने में दिक्कतें आ रही हैं। कई मक्खियां मर गईं। ऐसे में उन्हें फिर लाने में वक्त लगता है, क्योंकि रोहतक के अलावा कलानौर, हिसार, पानीपत आदि जगहों से इन मक्खियों को पकड़ना पड़ता है।
22 डिग्री में रखना होता है मक्खियों को
इस रिसर्च पर दो साल से काम कर रहे डॉ. वीरभान ने बताया कि ड्रोसोफिला का जीवन चक्र दो माह का ही होता है। इन्हें 22 डिग्री सेंटीग्रेड के तापमान पर रखना होता है। इससे बहुत ज्यादा या काफी कम तापमान पर इनका जिंदा रहना मुश्किल होता है।
बड़ी लैब में एक एसी से नहीं होगा फायदा
लैब का निरीक्षण करने वाले इंजीनियरिंग सेल के एसडीई (इलेक्ट्रिकल) राजेश गुलिया ने बताया कि एसी की मंजूरी कुलपति द्वारा दी जाती है। लैब का निरीक्षण किया था, लेकिन लैब काफी बड़ी है। इसमें एक एसी लगने से उसका कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा। यदि लैब का पार्टेशन हो, तो संभव है। आरटीआई का जवाब दे दिया गया है। एसी के लिए सेल से अप्रूवल भी भेजी जा चुकी है। कुलपति की मंजूरी मिलते ही एसी लगा दिया जाएगा।