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दस साल का रिपोर्ट कार्ड!
नई दिल्ली
Updated Mon, 17 Feb 2014 08:27 PM IST
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लोकसभा चुनावों से ऐन पहले अंतरिम बजट में वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने यह दिखाने की कोशिश की है कि देश की आर्थिक दशा दरअसल उतनी खराब नहीं है, जितनी समझी जा रही है। यदि उनके बजट भाषण पर गौर करें, तो पता चलेगा कि पिछले वर्ष की तुलना में न केवल वित्तीय घाटा कम हुआ है, बल्कि चालू खाते के घाटे को भी उन्होंने नियंत्रित किया है।
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यही नहीं, विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत हुआ है, कृषि विकास दर पहले से बेहतर स्थिति में है, थोक मूल्य उपभोक्ता सूचकांक पांच फीसदी से नीचे है और कुल मिलाकर सकल घरेलू उत्पाद, यानी जीडीपी के 4.9 फीसदी रहने का अनुमान है, जिसे अपेक्षाकृत बुरा भी नहीं कहा जा सकता। फिर मुश्किल कहां है?
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असल में, यह अर्थव्यवस्था की पूरी तस्वीर नहीं है। वित्त मंत्री एक ओर वित्तीय घाटे को और कम करने की बात कर रहे हैं, तो दूसरी ओर सब्सिडी कम करने का उनके पास कोई ठोस उपाय नहीं है। सच तो यह है कि खाद्य सुरक्षा, खाद और ईंधन पर दी जाने वाली सब्सिडी का आंकड़ा अगले वर्ष 2.5 लाख करोड़ रुपये को पार कर जाएगा। वह वैश्विक हालात का हवाला देकर कमजोर आर्थिक रफ्तार को जायज नहीं ठहरा सकते।
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उन्होंने कुछ घरेलू सामानों और वाहनों से उत्पाद शुल्क घटाकर मध्यवर्ग को लुभाने की कोशिश जरूर की है, लेकिन महंगाई और बैंक की बढ़ती दरें उसकी मुश्किलें कम नहीं होने दे रही हैं। यह चिदंबरम भी जानते हैं कि अगले कुछ हफ्तों के बाद जब चुनाव होंगे, तब विपक्ष यूपीए को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा, इसलिए उन्होंने बीते एक दशक की उन्हीं बातों को प्रमुखता से दिखाने की कोशिश की, जिससे यूपीए का रिपोर्ट कार्ड चमकता दिखे। फिर वह खाद्यान्न उत्पादन हो या फिर ग्रामीण इलाकों में बनीं सड़कें या फिर दस साल की औसत विकास दर।
उन्होंने इस बार भी अपने भाषण का समापन तमिल संत तिरुवल्लुवर की पंक्तियों के साथ किया कि बरछे या भाले से नहीं, बल्कि सिर्फ राजदंड यानी मजबूत शासन और समता से ही किसी शासक को विजय मिल सकती है; मगर उन्हें एहसास होगा कि नीतिगत जड़ता, घोटालों और भ्रष्टाचार ने यूपीए दो सरकार को पहले ही पस्त कर दिया है।