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पैंसठ के युद्ध की याद
अमर उजाला, नई दिल्ली
Updated Mon, 07 Sep 2015 08:50 PM IST
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भारत और पाकिस्तान के साझा इतिहास में दर्ज 1965 के युद्ध को इसी महीने पचास वर्ष हो गए, और इतने दशकों बाद दोनों देशों के बीच आज भी जो तल्खी कायम है, उससे यह युद्ध दोनों देशों के उतार-चढ़ाव भरे रिश्ते में एक पड़ाव की तरह लगता है। अपने चार हजार सैनिक गंवाने के बाद से हर वर्ष छह सितंबर को पाकिस्तान इस युद्ध की याद में डिफेंस डे मनाता आया है; वहीं भारत इसे अपनी विजय के रूप में याद करता है।
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1947 में अस्तित्व में आने के बाद से पाकिस्तान का रवैया भारत के प्रति मित्रता वाला नहीं रहा है। आजादी के करीब सात दशक बाद भी वह सिर्फ जम्मू-कश्मीर की रट लगा रहा है। 1947-48 में कबायलियों के हमलों से लेकर 1965 के युद्ध, और 1999 के कारगिल युद्ध तक जम्मू-कश्मीर ही पाकिस्तान के निशाने पर रहा है। यह बात अलग है कि हर बार उसे मुंह की खानी पड़ी है। इस मामले में 1971 के युद्ध को इसलिए अपवाद माना जा सकता है, क्योंकि इसका केंद्र पूर्वी पाकिस्तान था, जो इस युद्ध के बाद बांग्लादेश के रूप में सामने आया।
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1962 में चीन से हुए युद्ध में भारत की पराजय की पृष्ठभूमि में पाकिस्तान को यह लग रहा था कि वह कुछ भारतीय हिस्से को हथिया लेगा, मगर यह उसकी चूक थी। 1965 के बाद से न केवल वैश्विक व्यवस्था बदल गई है, बल्कि आतंकवाद के खिलाफ शुरू हुई अंतरराष्ट्रीय लड़ाई ने पाकिस्तान को बेनकाब भी किया है। दरअसल जम्मू-कश्मीर की आड़ में पाकिस्तान भारत के खिलाफ आतंकी गतिविधियों को अंजाम देता आया है। यह अकारण नहीं है कि पाकिस्तान ऐसे हर मौके को टालने की कोशिश करता है, जब भारत से उसके रिश्ते पटरी पर लौटते दिखते हैं। इसके पीछे वहां की सेना है, जिसकी दखलंदाजी के कारण ही वहां लोकतंत्र कमजोर है।
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हैरत यह भी है कि ऐसे समय जब एक युद्ध में उसकी पराजय की पचासवीं वर्षगांठ मनाई जा रही है, उसके सैन्य प्रमुख ने फिर जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत को धमकी दी है। जबकि न तो सैन्य क्षमता के मामले में और न ही आर्थिक ताकत के रूप में पाकिस्तान भारत के पासंग बैठता है। इस युद्ध का सबक पाकिस्तान के लिए यही होना चाहिए कि वह अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करे।