{"_id":"5a03cd9eb70b600a045cb63414c8fe78","slug":"real-justice","type":"story","status":"publish","title_hn":"नजीर बनने वाला फैसला","category":{"title":"Other Archives","title_hn":"अन्य आर्काइव","slug":"other-archives"}}
नजीर बनने वाला फैसला
नई दिल्ली
Updated Tue, 21 Jan 2014 07:37 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
फांसी की सजा पाए पंद्रह अपराधियों के दंड को उम्रकैद में बदलने का सर्वोच्च न्यायालय का फैसला ऐतिहासिक तो है ही, यह न्याय को मानवीय गरिमा भी प्रदान करता है। जिनकी सजा कम की गई है, वे कोई छोटे-मोटे अपराधी नहीं हैं; इनमें दर्जनों पुलिस जवानों को बारूदी सुरंगों में विस्फोट कर मार डालने वाले दस्यु हैं, तो एकाधिक आतंकवादी घटनाओं में शामिल दुर्दांत आतंकवादी और अपने ही परिवार के सदस्यों को नृशंसतापूर्वक मार डालने वाले विक्षिप्त लोग भी हैं।
विज्ञापन
इनके अपराधों की गंभीरता को देखते ही अदालतों ने इन्हें सजा-ए-मौत सुनाई थी। लेकिन उसके बाद राष्ट्रपति के पास दया याचिकाएं भेजने और उन पर निर्णय होने में ही इतने साल लग गए, जिसे किसी भी लिहाज से जायज नहीं ठहराया जा सकता। आतंकवादी देविंदर पाल भुल्लर को निचली अदालत ने 2001 में फांसी की सजा सुनाई थी, फिर विगत करीब तेरह साल से उनके जेल में होने का क्या औचित्य है?
विज्ञापन
इस दौरान कालकोठरी में रहते हुए वह मानसिक रोगी बन गए और कई बार उन्होंने आत्महत्या की कोशिश की। अदालत ने वीरप्पन के चार साथियों को फांसी की सजा 2004 में ही सुना दी थी, फिर उनकी दया याचिकाओं को खारिज होने में लगभग नौ साल क्यों लग गए? राजीव गांधी की हत्या के अपराध में फांसी की सजा पाए और वर्षों से जेल की कालकोठरी में बंद लोगों के बारे में तो कोई सुगबुगाहट तक नहीं है!
विज्ञापन
गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों की तार्किक निष्पत्ति में केंद्र सरकार ने जहां वर्षों से उदासीनता बरती है, वहीं पिछले वर्ष अफजल गुरु को आनन-फानन में फांसी देने के मामले में उसने नियम-कायदों को ताक पर रख दिया। सवाल कैदियों के मानवाधिकार का तो है ही, ऐसे मामलों में सरकार के स्तर पर राजनीति करने का अगर थोड़ा भी आरोप लगता है, तो वह बेहद गंभीर है।
इन्हीं विसंगतियों को देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ ने न केवल पिछले साल के अपने फैसले को पलटते हुए अब यह निर्णय दिया है, बल्कि उसने दया याचिका से संबंधित नए दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि इसके बाद फांसी की सजा पाए अपराधियों के प्रति सरकार का रवैया भी बदलेगा।