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और अब मुंबई
नई दिल्ली
Updated Fri, 23 Aug 2013 08:17 PM IST
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एक युवा फोटो-पत्रकार के साथ मुंबई में हुई सामूहिक बलात्कार की घटना ने हमारी सामूहिक चेतना को एक बार फिर झकझोर कर रख दिया है। यह घटना पुलिस के रोजनामचे में दर्ज होने वाला महिलाओं के खिलाफ महज एक और अपराध नहीं है, बल्कि एक समाज के रूप में हमारे पतन की एक और दास्तान भी है।
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इसने पिछले वर्ष दिल्ली में एक पैरामेडिकल छात्रा के साथ चलती बस में हुई सामूहिक बलात्कार की घटना की याद दिला दी है, जिसे लेकर पूरा देश उद्वेलित हो उठा था। दिल्ली की घटना के बाद बलात्कार के खिलाफ एक सख्त कानून लाया गया, जिसमें मृत्युदंड तक का प्रावधान किया गया है। मगर लगता है कि कहीं कुछ नहीं बदला है। दिल्ली और मुंबई की घटनाओं में काफी समानताएं भी हैं।
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साफ है कि महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों पर अंकुश लगाने के लिए सिर्फ कानून पर्याप्त नहीं है। मुंबई की घटना के बाद जिस तरह से लोगों का गुस्सा फूटा है, वह स्वाभाविक ही है, क्योंकि इसने इस महानगर में महिलाओं की सुरक्षा की कलई खोलकर रख दी है।
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यह ठीक है कि मुंबई पुलिस ने मुस्तैदी दिखाते हुए एक अपराधी को कुछ घंटे के भीतर ही पकड़ लिया, लेकिन सवाल है कि शाम छह-सात बजे जब वहशियों ने इस घटना को अंजाम दिया, तब वह कहां थी? राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़े बताते हैं कि मुंबई में महिलाएं पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं, वहां वर्ष 2012 में बलात्कार के 232 मामले दर्ज किए गए थे। यही नहीं, 2011 की तुलना में पिछले वर्ष इस महानगर में महिलाओं के उत्पीड़न की घटनाओं में 45 फीसदी की वृद्धि दर्ज की गई।
बलात्कार की घटनाओं को लेकर सामाजिक और आर्थिक गैरबराबरी जैसे तर्क बेमानी लगते हैं, यह सिवाय दरिंदगी के कुछ और नहीं है। असल में ऐसी घटनाओं के लिए पुरुषों की वह मानसिकता भी जिम्मेदार है, जो महिलाओं को न तो उनकी पारंपरिक घरेलू भूमिका से बाहर निकलते देखना चाहती है और न ही उनकी आर्थिक आत्मनिर्भरता को स्वीकार कर पा रही है।
ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए जरूरी यह भी है कि बलात्कार और यौन उत्पीड़न के मामलों का निपटारा जल्दी हो। मगर दिल्ली की घटना को ही देख लीजिए, जिसमें अभी तक सुनवाई ही चल रही है। त्वरित न्याय के साथ, जैसा कि मुंबई की युवा सांसद प्रिया दत्त ने सुझाव दिया है, सामाजिक सुधारों की भी जरूरत है, ताकि महिलाओं के सम्मान की रक्षा हो सके।