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छुट्टी पर राहुल
नई दिल्ली
Updated Tue, 24 Feb 2015 07:54 PM IST
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पश्चिम के देशों में राजनेताओं का अवकाश पर जाना बहुत आम है, मगर भारत में चूंकि राजनीति को पूर्णकालिक काम (या कुछ के लिए शगल) माना जाता है, लिहाजा इसमें छुट्टी की गुंजाइश कम ही होती है। इसीलिए बेहद अहम माने जा रहे संसद के बजट सत्र के मौके पर कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के छुट्टी पर चले जाने को सहजता से नहीं लिया जा रहा है। इससे पता चलता है कि देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी में उच्च स्तर पर सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है।
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कांग्रेस की ओर से आधिकारिक तौर पर सिर्फ यह बताया गया है कि राहुल हाल के कुछ घटनाक्रम और पार्टी के भविष्य को लेकर कुछ चिंतन करना चाहते हैं, इसलिए वह कुछ हफ्तों की छुट्टी पर रहेंगे। असल में लोकसभा चुनाव में मिली पराजय के बाद से कांग्रेस के भीतर बड़े बदलाव की बातें की जा रही थीं, यहां तक कि खुद राहुल ने भी ऐसे संकेत दिए थे। हालांकि नौ महीने बीत जाने के बावजूद पार्टी में किसी तरह का बदलाव तो नजर नहीं आया, इसके उलट लोकसभा चुनावों के बाद हुए विधानसभा चुनावों में पार्टी की दुर्गति रोकी नहीं जा सकी।
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जनवरी, 2013 में कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाए जाने के बाद से राहुल कांग्रेस को चुनावी सफलताएं दिलाना तो दूर, पार्टी में किसी तरह की जान तक नहीं फूंक सके हैं। वास्तव में उनके खाते में 2009 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को मिली 21 सीटों के अलावा कोई बड़ी उपलब्धि भी नहीं है।
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बात सिर्फ चुनावों की नहीं है, संसद में भी उनका प्रदर्शन निराशाजनक ही रहा है। उन्होंने ऐसे समय छुट्टी ली है, जब भूमि अधिग्रहण अध्यादेश जैसे अहम मुद्दे पर बात हो रही है, और जिसे खुद उन्होंने कभी बड़ा मुद्दा बनाया था। हैरानी की बात यह है कि एक ऐसी पार्टी में, जो नेतृत्व के मामले में गांधी-नेहरू परिवार से बाहर कुछ सोच भी नहीं पाती, क्या सचमुच राहुल अपनी मर्जी से पार्टी में बदलाव नहीं कर पा रहे हैं!
बेशक, कांग्रेस एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां सोनिया के करीबी माने जाने वाले पुरानी पीढ़ी के कुछ दिग्गजों और राहुल की पीढ़ी के युवा नेताओं में द्वंद्व चल रहा है। मगर इसके साथ ही यह सच है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष को पार्टी के साथ खुद में भी बदलाव लाने की जरूरत है। क्या वह इसके लिए तैयार हैं?