फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Other Archives ›   Raghuram Rajan's concerns

रघुराम राजन की चिंता

Fri, 26 Jun 2015 08:41 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Fri, 26 Jun 2015 08:41 PM IST
विज्ञापन
Raghuram Rajan's concerns

रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन उन विरल अर्थशास्त्रियों में से हैं, जिन्होंने 2008 की आर्थिक मंदी की आहट भांप ली थी। इसलिए मौजूदा वैश्विक आर्थिक परिदृश्य पर टिप्पणी करते हुए जब वह बीती सदी के तीसरे दशक की महामंदी की वापसी की आशंका जता रहे हैं, तो उसे बिल्कुल खारिज भी नहीं किया जा सकता। लंदन बिजनेस स्कूल में उनके भाषण को इसलिए गंभीरता से लिया भी गया है।

विज्ञापन


उनकी चिंता का कारण विकसित देशों की मौद्रिक नीतियां हैं, जिनका खामियाजा सबको भुगतना पड़ सकता है। आर्थिक सुस्ती के बीच केंद्रीय बैंकों पर विकास दर बढ़ाने का भीषण दबाव बना है, जिसके तहत न सिर्फ ब्याज दर कम की जाती है, बल्कि कर्ज देने के प्रावधान भी उत्तरोत्तर उदार किए गए हैं। कर्ज के बदले केंद्रीय बैंकों के पास जमाराशि रखने के प्रावधान को महत्वहीन करने के खतरे हैं।
विज्ञापन


2008 की मंदी में अमेरिका-यूरोप के बैंक दिवालिया हुए थे, तो इसके पीछे यह एक वजह थी। शुक्र है कि अपने यहां कर्ज देने के रिजर्व बैंक के प्रावधान अब भी काफी सख्त हैं, इसलिए अनहोनी की वैसी आशंका नहीं। पर सिर्फ इस वजह से नहीं, राजन की चिंता वस्तुतः मुद्राओं का अवमूल्यन करने की कोशिश के कारण भी है। मुद्रा का अवमूल्यन कर एक देश अपना निर्यात बढ़ाता है, तो दूसरे देश को नुकसान होता है, मजबूरन उसे भी इस रास्ते पर चलना पड़ता है।
विज्ञापन
विज्ञापन


महामंदी के दौर में तब की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में अपनी मुद्राओं का अवमूल्यन करने की होड़ मची थी। राजन ने हालांकि किसी का नाम नहीं लिया है, पर यूरो (यूरोपीय संघ) और येन (जापान) के अवमूल्यन को इस संदर्भ में खासकर देखा जा सकता है। वह इसीलिए जोर देकर खेल के नियम बदलने की बात कर रहे हैं। बेशक भारत इस मंदी की छाया में नहीं है।


बहुविध आंकड़े ही नहीं, खुद रघुराम राजन भी स्वीकार करते हैं कि पिछले दो वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था और मजबूत हुई है। पर भूमंडलीकृत विश्व में अगर विकसित अर्थव्यवस्थाएं मुश्किलों में घिर जाएं, तो भारत उनके असर से किस तरह बचा रह सकता है! राजन ने पहले भी कहा था कि जब हाथी लड़ते हैं, तो नुकसान घास को भी होता है। चिंता की बात यही है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed