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बैंकिंग लाइसेंस काफी नहीं
नई दिल्ली
Updated Thu, 03 Apr 2014 07:43 PM IST
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बहुत सोच-विचार के बाद रिजर्व बैंक ने फिलहाल ढांचागत विकास क्षेत्र की वित्तीय कंपनी आईडीएफसी और लघु वित्त कंपनी बंधन फाइनेंशियल सर्विस को बैंकिंग लाइसेंस की सैद्धांतिक मंजूरी दी है, तो इसे समझा जा सकता है। नए बैंकिंग लाइसेंस देने की बात यूपीए सरकार ने 2010-11 के बजट में की थी, और मौजूदा वित्त मंत्री चिदंबरम चाहते थे कि चुनाव से पहले इस पर अमल हो।
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लेकिन केंद्रीय बैंक के सामने दो चुनौतियां थीं-एक तो सरकारी बैंकों में गैर निष्पादित पूंजी यानी एनपीए का बोझ जिस खतरनाक स्तर तक बढ़ गया है, उसे देखते हुए नए बैकिंग लाइसेंस जारी करने में जल्दबाजी नहीं की जा सकती। सिर्फ यही नहीं कि इस महीने अपना पद छोड़ रहे रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर के सी चक्रवर्ती ने बैंकों के बढ़ते एनपीए पर ध्यान दिलाया है, बल्कि कुछेक अंतरराष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों ने भी इस पर चिंता जताई है।
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फिर कतिपय उद्योग घरानों की जो छवि, दुर्योग से, बन गई है, उसे देखते हुए भी निजी क्षेत्र में बैंकिंग लाइसेंस जारी करते हुए सतर्कता की जरूरत है। जिन दो कंपनियों को बैंकिंग लाइसेंस की सैद्धांतिक मंजूरी दी है, उनकी छवि और ट्रैक रिकॉर्ड पर तो कोई संदेह नहीं है। देश के बुनियादी ढांचे के विकास में अगर आईडीएफसी का बड़ा योगदान रहा है, तो बंधन ने उस पश्चिम बंगाल में पिछड़ी महिलाओं के लिए उल्लेखनीय काम की शुरुआत की, जहां गैरसरकारी वित्तीय संस्थाओं का कामकाज ज्यादातर संदिग्ध रहा है।
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पर बड़ी-बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों के साथ काम कर चुकी आईडीएफसी के सामने ग्रामीण भारत में जरूरतमंदों को कर्ज देने की चुनौती होगी, तो गरीबों के लिए काम करने वाली कंपनी बंधन को विदेशी विनिमय और बांड बाजार से तालमेल बिठाना होगा। नए बैंकिंग लाइसेंस को आर्थिक सुधार की अगली कड़ी बताया तो जा रहा है, पर ग्रामीण भारत में बैकिंग का जो हाल है, उसे देखते हुए सिर्फ नए बैंक खोलना ही समाधान नहीं, बल्कि वहां की समूची कार्यसंस्कृति में पारदर्शिता की जरूरत होगी।
भारत अब तक आर्थिक मंदी से ज्यादातर अप्रभावित रहा है, तो इसकी वजह इसकी मजबूत बैंकिंग प्रणाली भी है। लेकिन अब जबकि हमारे बैंकों की सेहत पर लगातार चिंता जताई जा रही है, तब फूंक-फूंककर कदम उठाना ही सही होगा।