धर्म की गरिमा का सवाल
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
धर्माचार्य या महामंडलेश्वर जैसे पदों से सुशोभित लोग हमेशा अपने ज्ञान और वैराग्य के लिए जाने जाते हैं। लेकिन इधर कुछ ऐसे मामले सामने आए हैं, जिनसे यह छवि थोड़ी-बहुत खंडित होती दिखाई पड़ी है। पहले सचिन दत्ता नाम के एक ऐसे व्यक्ति को संन्यास धारण के अगले ही दिन महामंडलेश्वर बना दिया गया, जो बिल्डर होने के साथ-साथ डिस्कोथेक और बार चलाते थे! उनके रसूख का आलम यह था कि उनके डिस्कोथेक शासन द्वारा निर्धारित अवधि के बाद भी खुले रहते थे। बताया तो यह भी जाता है कि आनन-फानन में उन्हें महामंडलेश्वर बनाने के पीछे सत्ता से उनकी नजदीकी एक बड़ी वजह रही। पर असलियत सामने आने के बाद उन्हें पद से बर्खास्त करना पड़ा।
दूसरा मामला धर्मगुरु राधे मां का है, जिनके खिलाफ दहेज उत्पीड़न से लेकर अश्लीलता फैलाने के मामले सामने आए हैं। नासिक कुंभ में प्रवेश पर प्रतिबंध लगने के बाद वह गायब हो गई हैं, लिहाजा उनके खिलाफ लुकआउट नोटिस जारी किया गया है। पंजाब के मुकेरियां में रहने वाली एक सामान्य महिला का अचानक मुंबई में एक ग्लैमरस शख्सियत में तब्दील हो जाना आस्था का सहारा लेकर जनसामान्य की भावनाओं से खेलने का उदाहरण है।
धर्मगुरु अगर शराब का सेवन करें या सोशल मीडिया पर अपनी अशालीन तस्वीरें डालें, तो उनकी अपनी छवि तो खराब होती ही है, इसके छींटे धर्म और अध्यात्म की धवल दुनिया पर भी पड़ते हैं। इससे उन अखाड़ों की गरिमा गिरती है, जो सनातन हिंदू धर्म का प्रतिनिधित्व करते हैं। सचिन दत्ता उर्फ सच्चिदानंद गिरि और राधे मां ने तो अपने व्यवहार से धर्म की गरिमा कम की ही है, इसमें उनका भी दोष कम नहीं, जिन्होंने ऐसे लोगों को आगे बढ़ाया। यह ठीक है कि ये मामले सामने आने के बाद अखाड़ों ने भी इनके खिलाफ सख्ती दिखाई है, लेकिन सिर्फ इतना काफी नहीं है। भविष्य में इस तरह की घटनाएं न हों, इसके लिए जरूरी यह होगा कि किसी को महामंडलेश्वर जैसी पदवी देने से पहले उनके व्यक्तित्व के बारे में पूरी तरह जांच-पड़ताल की जाए। जो आदमी खुद ही लोभ, मोह और माया से मुक्त नहीं हो पाया है, वह भला समाज को धर्म के बारे में बताने का अधिकारी कैसे हो सकता है!