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मुजफ्फरनगर के बहाने
नई दिल्ली
Updated Sun, 29 Dec 2013 07:37 PM IST
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चारा घोटाले में रांची की जेल से जमानत पर छूटे लालू प्रसाद यादव का अचानक मुजफ्फरनगर के राहत शिविरों में पहुंचना क्या संयोग है! जेल से बाहर निकलने के बाद सोनिया गांधी ने उनसे टेलीफोन पर जिस ढंग से संपर्क किया, और खुद लालू पिछले दो दिनों से राहुल गांधी की शान में जिस तरह कसीदे पढ़ रहे हैं, वह तो आगामी लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस और राजद के बीच गठजोड़ का ही संकेत देता है, जिसमें देर-सबेर रामविलास पासवान की लोजपा भी शामिल हो, तो आश्चर्य नहीं।
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2004 के लोकसभा चुनाव में इन तीनों ने मिलकर बिहार में चालीस में से उनतीस सीटें जीती थीं, पर 2009 में यह गठजोड़ टूटा, तो राजद और कांग्रेस क्रमशः चार व दो सीटों पर सिमट गईं, जबकि लोजपा को एक भी सीट नहीं मिली। यह संभव है कि विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद सोनिया गांधी को लालू की याद आई हो, जिनके सहारे बिहार और झारखंड ही नहीं, उत्तर प्रदेश के मुस्लिम बहुल इलाकों में भी कुछ उम्मीद बन सकती है। चूंकि मुस्लिम-यादव समीकरण के सहारे लालू ने बिहार में डेढ़ दशक तक सत्ता चलाई, इसलिए नरेंद्र मोदी की लहर के मुकाबले संप्रग धर्मनिरपेक्षता के प्रतीक के तौर पर तो उन्हें पेश कर ही सकता है।
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लेकिन राहत शिविरों में रह रहे लोगों से घर लौट जाने की बात कहकर लालू ने जता दिया कि उन्हें न उनकी संवेदना से कुछ लेना-देना है, न वह उनकी वस्तुस्थिति के बारे में जानते हैं; राहुल गांधी ने भी पिछले सप्ताह शामली आकर दंगा प्रभावितों से घर लौटने को कहा था। जबकि सच्चाई यह है कि दंगों से प्रभावित इन लोगों का सब कुछ लुट चुका है और अपने गांवों में इनकी सुरक्षा की गारंटी नहीं है। लेकिन हैरत देखिए कि इसके लिए राज्य की सपा सरकार को निशाना बनाने के बजाय लालू भाजपा को कोसते हैं।
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कांग्रेस और राजद का गठजोड़ तो अपनी जगह है, पर सवाल यह कि आप की उभार के बाद जो राहुल गांधी भ्रष्टाचार को बर्दाश्त करने के मूड में नहीं हैं, और अब आदर्श घोटाले की जांच रिपोर्ट पर पुनर्विचार करने का पार्टी पर दबाव बना रहे हैं, क्या वह एक ऐसे शख्स के साथ गठजोड़ करना चाहेंगे, जिनकी संसद सदस्यता चारा घोटाले में मिली सजा के कारण चली गई हो।