दूसरे विकल्प की तलाश

नई दिल्ली Updated Tue, 22 Oct 2013 08:06 PM IST
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Quest for second option

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पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने अपनी अमेरिका यात्रा के दौरान एक बार फिर कश्मीर मसले का अंतरराष्ट्रीयकरण करने का प्रयास किया है, दूसरी ओर इस अड़ियल मुल्क की ओर से लगातार संघर्ष विराम समझौते का उल्लंघन कर भड़काने वाली कार्रवाई भी जारी है।
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शरीफ ने जब कुछ महीने पहले पाकिस्तान की कमान संभाली थी, तब उम्मीद की जा रही थी कि वह भारत-पाकिस्तान के द्विपक्षीय संबंधों को नई दिशा देंगे। मगर उनके इस रवैये से साफ है कि पाकिस्तान की मूल सोच में कोई बदलाव नहीं आया है; बावजूद इसके कि यह देश खुद भी आतंकवाद से जूझ रहा है, उसकी अर्थव्यवस्था जर्जर हो चुकी है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी वह अलग-थलग पड़ता जा रहा है।
इसमें दो राय नहीं कि द्विपक्षीय मसलों को बातचीत से ही सुलझाया जा सकता है, मगर ऐसी बातचीत शत्रुतापूर्ण माहौल में तो नहीं हो सकती। ऐसा नहीं हो सकता कि दोनों देशों के हुक्मरान तो वार्ता की मेज पर आमने-सामने हों और सीमा पर गोले दागे जाते रहें! हालत यह हो गई है कि नियंत्रण रेखा और अंतरराष्ट्रीय सीमा के नजदीक सांबा, अखनूर और आरएस पुरा के इलाके में रहने वाले लोगों को सीमा पार से हो रही गोलाबारी के कारण सुरक्षित जगहों पर जाना पड़ रहा है।
ऐसे में जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला यदि पाकिस्तान के खिलाफ 'दूसरे विकल्प' की बात कर रहे हैं, तो उनकी तकलीफ समझी जा सकती है। असल में, यह दूसरा विकल्प जरूरी नहीं कि सैन्य विकल्प ही हो। राजनयिक स्तर पर ऐसे प्रयास होने चाहिए, जिससे पाकिस्तान पर आतंकवाद को पोषित करने वाली नीतियों को छोड़ने का दबाव बढ़े। अब कुछ ऐसे सख्त कदम उठाने का वक्त आ गया है, जिसका जमीनी स्तर पर भी असर दिखे।

अच्छी बात यह है कि अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन केरी ने शरीफ से मुलाकात के दौरान कश्मीर पर अपने देश के पुराने रुख को ही रेखांकित किया है और इस द्विपक्षीय मसले पर हस्तक्षेप से इंकार किया है। दूसरी ओर रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने भी भारतीय प्रधानमंत्री के साथ संयुक्त बयान में पाकिस्तान की आतंकवाद को पोषित करने वाली नीतियों की कड़ी निंदा की है। इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि भारत भी पाकिस्तान के साथ बातचीत की किसी तरह की हड़बड़ी न दिखाए।
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