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बो शिलाई के बहाने

Sun, 25 Aug 2013 08:59 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Sun, 25 Aug 2013 08:59 PM IST
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punishment of bo xilai

कम्युनिस्ट तानाशाही वाले चीन में एक पूर्व पार्टी नेता और पोलित ब्यूरो सदस्य बो शिलाई पर लगे रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग की जांच में जो चीजें सामने आई हैं, वे नई बेशक नहीं हैं, लेकिन यह हैरान करने वाला तथ्य जरूर है कि गोपनीयता के कारण वहां शीर्ष स्तर पर जो अनियमितताएं पहले दब जाती थीं, वे अब सामने आने लगी हैं।

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बो शिलाई के मामले ने इतना तूल पकड़ा, तो इसकी दो तात्कालिक वजहें समझ में आती हैं-एक तो उनकी पत्नी को एक ब्रिटिश नागरिक को जहर देकर मारने का दोषी पाया गया, दूसरे, बो के उत्पीड़न से घबड़ाकर उनके एक नजदीकी पुलिस प्रमुख ने अमेरिकी वाणिज्य दूतावास में शरण ली थी। जाहिर है, इसके बाद इस मामले को दबा देना उस कम्युनिस्ट नेतृत्व के लिए आसान नहीं था, जो शीर्ष स्तर पर न जाने कितने नेताओं के भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग के मामलों को इससे पहले रफा-दफा कर चुका है।
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इसके बावजूद यह मानना भोलापन ही होगा कि चीन में नेतृत्व परिवर्तन के बाद न्याय और पारदर्शिता का दौर सचमुच शुरू हो गया है। जो कम्युनिस्ट नेतृत्व बो शिलाई मामले की जांच कर रहा है, वह इस बात पर भी उतना ही चिंतित है कि उसकी व्यवस्थागत बुराइयों के बारे में अब दुनिया को पता चल रहा है।
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चीन की कम्युनिस्ट सत्ता बो शिलाई को अगर मृत्युदंड देती है, तो कोई हैरानी नहीं होगी; भले ही उस फैसले को फिलहाल स्थगित कर दिया गया है, लेकिन उनकी पत्नी को सजा-ए-मौत सुनाई ही गई है। इसकी वजह यह है कि वहां भ्रष्टाचारियों को सजा देने का यही निरंकुश तरीका है।


इसलिए अपने यहां चीन के इस घटनाक्रम को भले सबक की तरह पेश न किया जाए, पर यह सच्चाई तो अपनी जगह है ही कि एक के बाद एक घोटाला सामने आने के बाद भी हमारे यहां भ्रष्टाचारियों के खिलाफ समुचित कार्रवाई की इच्छाशक्ति नहीं दिखती। यूपीए सरकार की छवि इतनी धूमिल हुई है, तो इसकी एक वजह यह भी है कि इसने भ्रष्टाचार के विरुद्ध कोई सख्त कदम नहीं उठाया। यह ठीक है कि कम्युनिस्ट तानाशाही वाले चीन से हमारी कोई तुलना नहीं हो सकती, लेकिन यह वाकई विडंबना है कि लोकतांत्रिक ढांचे के पारदर्शी दायरे में भी हमारे यहां भ्रष्टाचारी फल-फूल रहे हैं।

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