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न्याय पर आंच न आए

Mon, 11 Mar 2013 10:49 PM IST
Updated Mon, 11 Mar 2013 10:49 PM IST
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prime accused in delhi gangrape case ram singh commits suicide in tihar Jail

राजधानी दिल्ली में पिछले वर्ष 16 दिसंबर को एक 23 वर्षीय पैरा मेडिकल छात्रा के साथ हुई बलात्कार की बर्बर घटना के मुख्य आरोपी राम सिंह की तिहाड़ जेल में संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत ने न्यायिक प्रक्रिया को तो धक्का पहुंचाया ही है, इससे हमारी जेल और पुलिस व्यवस्था भी कठघरे में खड़ी हो गई है।

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जैसा कि खुद गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने भी माना है कि प्राथमिक स्तर पर यह मामला खुदकुशी का लग रहा है, मगर न्यायिक जांच से ही पूरी स्थिति स्पष्ट होगी। हैरान करने वाली बात यह है कि एक ऐसे मामले के आरोपी की देश की सबसे सुरक्षित जेल में मौत कैसे हो गई, जिस पर दुनिया भर की नजर है।
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इस घटना ने देशभर में लोगों को उद्वेलित कर दिया था, और इसके बाद ही महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सख्त कानून की जरूरत महूसस की गई। साथ ही न्यायिक और पुलिस सुधार को लेकर भी विमर्श तेज है और राम सिंह की मौत के बाद तो इस तरह के सुधार और भी जरूरी लग रहे हैं।
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इस घटना ने तिहाड़ की लचर व्यवस्था को भी उजागर किया है। हालांकि तिहाड़ कोई अपवाद नहीं है, देश की तमाम जेलों का हाल बुरा है। वहां क्षमता से ज्यादा कैदी हैं, जिन पर हर समय निगरानी रखना संभव नहीं हो पाता। तिहाड़ की ही बात करें, तो वहां क्षमता से दो गुना कैदी हैं और पिछले 15 महीने के दौरान ही वहां अस्वाभाविक मौत की यह तीसरी घटना है।

सवाल है कि राम सिंह की मौत के बाद उस मामले का क्या होगा, क्या बाकी के आरोपियों को कुछ राहत मिल जाएगी? मामला कमजोर तो नहीं होगा? असल में यही पुलिस और न्यायिक व्यवस्था की बड़ी जिम्मेदारी है कि उस होनहार युवती के बाकी के गुनहगारों को सजा दिलाए, जिसने अपने साथ हुई ज्यादती के बावजूद आखिरी सांस तक संघर्ष किया।


इस पर भी गौर करने की जरूरत है कि ऐसे जघन्य मामले के आरोपियों पर निगरानी रखने की जेलों में क्या व्यवस्था हो, क्योंकि उनमें आत्महत्या की प्रवृत्ति पनप सकती है। बेशक राम सिंह के परिजनों को उसकी मौत का सच जानने का हक है, पर इसकी आड़ में सहानुभूति की लहर गलत प्रवृत्तियों को जन्म दे सकती है। इस घटना को सामूहिक बलात्कार की जघन्य घटना की कानूनी प्रक्रिया में रुकावट नहीं बनने देना चाहिए।

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