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महंगाई के मोर्चे पर
नई दिल्ली
Updated Tue, 17 Jun 2014 07:55 PM IST
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की वित्तीय स्थिति को पटरी पर लाने के लिए कड़े फैसले लेने के संकेत दिए हैं, मगर महंगाई के ताजा आंकड़े बताते हैं कि उनकी पहली आर्थिक चुनौती बेकाबू होती कीमतों को नियंत्रित करने के रूप में सामने खड़ी है। थोक महंगाई दर पांच माह के अपने उच्चतम स्तर पर है, जबकि खाद्य पदार्थों की महंगाई दर दो अंकों के करीब पहुंच गई है। मोदी सरकार को अभी सत्ता में आए एक महीना भी नहीं हुआ है, लिहाजा इसके लिए उसे जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
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मगर यह नहीं भूलना चाहिए कि महंगाई एक ऐसा मुद्दा है, जो किसी भी सरकार को अलोकप्रिय बना सकता है। आखिर यूपीए सरकार के जाने की एक बड़ी वजह महंगाई के मोर्चे पर उसकी चौतरफा नाकामी भी थी। दरअसल प्रधानमंत्री जब वित्तीय स्थिति को मजबूत करने की बात करते हैं, तो इसका साफ मतलब है कि इसके लिए निवेश और औद्योगिक उत्पादन बढ़ाना होगा। लेकिन सीसीआई जैसे औद्योगिक संगठन का आकलन है कि औद्योगिक उत्पादन को गति देने के लिए महंगाई को नियंत्रित करना जरूरी है।
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वास्तव में खाद्य पदार्थों की कीमतें जिस तेजी से बढ़ रही हैं, उससे देश की अधिसंख्यक आबादी की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। इस बीच, इराक में जारी गृह युद्ध के कारण कच्चे तेल के दाम नौ माह के अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गए हैं। इराक भारत का दूसरा बड़ा तेल आपूर्तिकर्ता है, लिहाजा यदि वहां संकट लंबा खिंचता है, तो उसका असर भी अंततः हमारे यहां जरूरी चीजों की कीमतों पर ही पड़ेगा।
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इसके अलावा प्याज को लेकर नासिक के लासलपुर मंडी से आ रही खबरें भी आम आदमी की मुश्किलें बढ़ाती दिख रही हैं। रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन का कहना है कि खाद्य प्रबंधन के जरिये महंगाई को नियंत्रित किया जा सकता है। वास्तव में सरकार महंगाई के लिए इराक संकट या कमजोर मानसून की आड़ लेकर अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती। खासकर खाद्यान्न के मामले में तो यह इसलिए कहा जा सकता है, क्योंकि हमारे यहां असल संकट इसके रख रखाव और वितरण का है।
बेशक, जब मोदी सरकार अपना पहला बजट पेश करेगी, तो उसका आर्थिक रोड मैप सामने आएगा, लेकिन इस वक्त उसकी पहली प्राथमिकता महंगाई को नियंत्रित करने की होनी चाहिए, जैसा कि खुद राष्ट्रपति ने अपने अभिभाषण में कहा था।