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दबाव की राजनीति
नई दिल्ली
Updated Tue, 11 Nov 2014 11:17 PM IST
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महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस की अगुआई में अल्पमत सरकार का गठन करने के साथ भाजपा ने पहले ही पर्याप्त संकेत दे दिए थे कि वह अब शिवसेना के बिना भी चलने को तैयार है। दरअसल शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे भाजपा नेतृत्व के इरादों को समझ तो रहे ही होंगे, लेकिन वह अपनी जिद में इतनी दूर चले आए हैं कि वहां से उनके लिए लौटना मुश्किल होगा!
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उनके तरकश के हर तीर को मोदी और शाह की जोड़ी ने नाकाम कर दिया है और साफ कर दिया है कि बदली राजनीतिक परिस्थितियों में शिवसेना को भाजपा की गरज हो सकती है, भाजपा का काम शिवसेना के बिना भी चल सकता है। यही वजह है कि शिवसेना और भाजपा के बीच बात नहीं बन पाई, वरना भाजपा नेतृत्व चाहता, तो कोई न कोई बीच का रास्ता जरूर निकाल लेता, ताकि शिवसेना को मुंह छिपाने की जगह मिल सके। बची-खुची कसर सुरेश प्रभु के भाजपा में शामिल होने और फिर केंद्रीय रेल मंत्री बनने से पूरी हो गई।
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असल में फडणवीस मंत्रिमंडल में शामिल न होकर विधानसभा में विपक्ष में बैठने का फैसला उद्धव ने बेहद हताशा में लिया है, क्योंकि इसके अलावा अब उनके पास कोई चारा भी नहीं था। वरना विधानसभा चुनाव में तीसरे नंबर पर आई कांग्रेस विपक्ष के नेता पद पर पहले ही दावा जता चुकी है। त्रिशंकु विधानसभा बनने के बाद उद्धव को लग रहा था कि उनके समर्थन के बिना भाजपा की सरकार बन नहीं पाएगी, जिससे वह गठबंधन सरकार के लिए पर्याप्त दबाव बना सकते हैं।
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लेकिन मानो राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ऐसे ही किसी मौके की तलाश में थी, जिसने पहले ही भाजपा को बिना शर्त समर्थन देने का ऐलान कर दिया। विधानसभा के पहले दिन जिस तरह से शिवसेना के विधायक भगवा साफा बांधकर पहुंचे थे और जिस तरह से पार्टी नेताओं ने फडणवीस सरकार की मराठी स्कूलों में उर्दू की पढ़ाई शुरू करने की योजना का विरोध किया, उससे साफ है कि यह पार्टी हिंदुत्व के अपने पुराने एजेंडे को फिर से तराशेगी।
वहीं विधानसभा में उसके अलग राह चुनने का असर बृहनमुंबई नगर निगम पर हो सकता है, जहां अभी शिवसेना और भाजपा गठबंधन का कब्जा है। शिवसेना केंद्र में एनडीए के साथ बनी रहेगी या नहीं, इसका बहुत मतलब नहीं रह गया है। लेकिन उद्धव की सबसे बड़ी चिंता फिलहाल अपने विधायकों को एकजुट रखने की होगी।