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... और प्राण को फाल्के
नई दिल्ली
Updated Fri, 12 Apr 2013 10:43 PM IST
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प्राण किशन सिकंद को भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च पुरस्कार दादा साहब फाल्के अवार्ड से नवाजे जाने के ऐलान से इस पुरस्कार की महत्ता ही बढ़ी है। अपने छह दशक लंबे करियर के जरिये भारतीय सिनेमा को नई ऊंचाइयां देने वाले प्राण ने एक कलाकार के रूप में जितनी विविधता का प्रदर्शन किया, वैसी मिसालें कम ही मिलती हैं।
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जिस देश में गंगा बहती है का राका हो या उपकार के मलंग चाचा, या फिर जंजीर का शेर खान, प्राण ने विलेन से लेकर नायक और चरित्र अभिनेता के रूप में अपने हर किरदार को जीवंत बना दिया। वह इतने बड़े फलक के कलाकार हैं कि उनका आकलन करना आसान नहीं है।
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फिर भी पिछली सदी के चालीस के दशक से लेकर 90 के दशक के अंतिम वर्षों तक फैले उनके करियर को चाहे जिस कसौटी पर परखा जाए, वह खरा ही उतरते हैं। लाहौर में पंजाबी फिल्म यमलाजट से अभिनय की शुरुआत करने वाले प्राण को संघर्ष भी कम नहीं करने पड़े। लेकिन विभाजन के बाद उन्होंने मुंबई में कदम रखते ही पीछे मुड़कर नहीं देखा।
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यदि 1990 के अंतिम वर्षों में उन्होंने काम करना बंद किया, तो इसलिए नहीं कि उनकी पूछ कम हो गई थी, बल्कि इसलिए कि उम्र उनका साथ दे नहीं रही थी। तकरीबन चार सौ फिल्मों में अभिनय करने वाले प्राण उन चुनींदा कलाकारों में से हैं, जिन्होंने बॉलीवुड की तीन दमदार पीढ़ियों के साथ काम किया।
पहले दौर में यदि अशोक कुमार, दिलीप कुमार, राज कपूर और देव आनंद उनके समकालीन थे, तो उसके बाद शम्मी कपूर, राजेंद्र कुमार और धर्मेंद्र और फिर राजेश खन्ना, अमिताभ बच्चन और विनोद खन्ना। इससे उनकी रेंज का पता चलता है। फिल्मों को लेकर उनकी समझ भी बहुत साफ है, जैसा कि एक साक्षात्कार में उन्होंने विलेन और नकारात्मक भूमिका के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा था कि विलेन कई बार अच्छा आदमी भी साबित होता है।
संभवतः वही ऐसे पहले विलेन थे, जिसे एक समय फिल्मों के नायकों से भी अधिक पारिश्रमिक मिलता था। उनकी लोकप्रियता का आलम यह था कि उनकी अभिनीत आधे से अधिक फिल्मों के पोस्टर में प्रमुख कलाकारों के साथ उनका नाम खास जोर देते हुए... ‘और प्राण के साथ’ दर्ज किया गया। वह अविभाजित भारत की उस पीढ़ी से आते हैं, जिसके साथ भारतीय सिनेमा जवान हुआ। यह वाकई गौरव की बात है कि 93 बरस के प्राण को यह सम्मान तब दिया जा रहा है, जब भारतीय सिनेमा अपनी शताब्दी मना रहा है।