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बदले-बदले से प्रचंड
नई दिल्ली
Updated Thu, 02 May 2013 01:45 AM IST
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एकीकृत नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेता पुष्प कमल दहल प्रचंड के भारत के प्रति बदलते रुख को दोनों देशों के रिश्तों की दिशा में सकारात्मक संकेत माना जाना चाहिए। बावजूद इसके कि नई दिल्ली आने से पहले वह चीन गए थे, जहां उन्होंने वहां के नए नेतृत्व से मुलाकात कर रिश्तों के नए आयाम तलाशने की कोशिश की।
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असल में वह नेपाल, चीन और भारत के बीच जिस त्रिपक्षीय सहयोग की बात कर रहे हैं, उसे तौलने की जरूरत है, खासकर इसलिए, क्योंकि तीन वर्ष पहले प्रधानमंत्री बनने के बाद उनका झुकाव भारत के बजाय चीन की ओर अधिक था।
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यह किसी से छिपा नहीं है कि अपने प्रधानमंत्रित्वकाल में उन्होंने भारत और अमेरिका पर नेपाल में अस्थिरता फैलाने और चीन के खिलाफ साजिश रचने तक के आरोप लगाए थे। मगर अब वह अपने देश की भू-राजनीतिक स्थिति का हवाला देकर अपने दोनों पड़ोसी और तेजी से आगे बढ़ती आर्थिक ताकतों के साथ बराबरी का रिश्ता चाहते हैं, तो यह उनकी मजबूरी भले हो, पर हिमालय क्षेत्र की शांति और स्थिरता के लिहाज से यह अहम है।
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नेपाल में जारी राजनीतिक गतिरोध के पीछे कहीं न कहीं इन दोनों देशों के साथ रिश्तों की फांस आड़े आती रही है और माओवादी पार्टियों पर चीन समर्थक होने के आरोप भी लगते रहे हैं। दरअसल 2006 में राजशाही के खात्मे के बाद से नेपाल निरंतर राजनीतिक अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है, वहां संविधान सभा का कार्यकाल पहले तो कई बार बढ़ाया गया और आखिरकार नए संविधान के अस्तित्व में आए बिना ही उसकी अवधि भी खत्म हो गई। इस बीच, माओवादी पार्टी भी विभाजित हो गई।
इस राजनीतिक अस्थिरता का असर पहले से ही बदहाल नेपाल की आर्थिक दशा पर पड़ा है। ऐसे में, प्रचंड चीन और भारत के साथ त्रिपक्षीय सहयोग की संभावनाएं देख रहे हैं, तो उसके पीछे आर्थिक और व्यापारिक कारण भी हैं।
उनके बदले हुए रुख का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि अपनी चीन यात्रा के दौरान वह माओ से अधिक आर्थिक सुधार और उदारीकरण लाने वाले देंग श्याओ पिंग से प्रभावित नजर आए। मगर यह प्रचंड भी जानते हैं कि उन्हें अपने दोनों पड़ोसियों से कहीं अधिक चुनौती नेपाल के भीतर से है, जहां नवंबर में दूसरी संविधान सभा के चुनाव होने हैं।