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लाल बत्ती का रुतबा

Tue, 10 Dec 2013 07:05 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Tue, 10 Dec 2013 07:05 PM IST
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power of red light

देश को औपनिवेशिक दासता से मुक्त हुए साढ़े छह दशक हो गए हैं, लेकिन अंग्रेजों के समय से चली आ रही प्रवृत्तियां आज भी खत्म नहीं हो सकी हैं। लाल या नीली बत्ती वाले वाहनों में चलने का रुतबा ऐसी ही सामंती प्रवृत्ति का प्रतीक है, जिसे लेकर सर्वोच्च अदालत ने नाराजगी जताई है।

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वैसे यह पहला मौका नहीं है; इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट केंद्र और राज्य सरकारों को लाल बत्ती और सायरन वाले वाहनों के दुरुपयोग पर फटकार लगा चुका है। अब उसने निर्देश दिए हैं कि वाहनों में लाल बत्ती के इस्तेमाल की इजाजत सिर्फ सांविधानिक और उच्च पदों पर बैठे लोगों को होगी।
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हैरत की बात है कि जो काम संसद या सरकारों को करना चाहिए, उसके लिए न्यायपालिका को पहल करनी पड़ रही है। दरअसल लाल या नीली बत्ती रसूख और रुतबे का प्रतीक बन गई हैं; फिर ऐसे वाहनों में बैठे लोगों को इस बात की परवाह भी नहीं होती कि उनकी वजह से सड़क पर चलते आम आदमी को कितनी परेशानी उठानी पड़ती है। वास्तव में इस व्यवस्था ने आजाद भारत में नागरिकों के दो वर्ग तैयार कर दिए हैं।
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हालांकि जबसे यह मामला संज्ञान में आया है, यह बहस भी चल रही है कि आखिर किन्हें वीआईपी या विशिष्ट जन माना जाए। सांविधानिक रूप से देखें, तो यह दायरा काफी बड़ा हो जाता है, क्योंकि इसमें राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, लोकसभा अध्यक्ष, प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष, कैबिनेट मंत्री, मुख्य न्यायाधीश, मुख्य चुनाव आयुक्त और कैग सहित सभी सांविधानिक संस्थाओं के प्रमुख आ जाते हैं।

यही हाल नीली बत्ती वाले वाहनों का है, जिन्हें पुलिस, सेना और अग्निशमन सेवा से संबंधित वाहनों के लिए अधिकृत किया गया है, पर इसका भी दुरुपयोग रोका नहीं जा सका है। जिस देश में यातायात नियमों को तोड़ने वाले सौ-पचास रुपये देकर छूट जाते हों, वहां बहुत कुछ बदलने की जरूरत है।


अच्छी बात है कि जयराम रमेश ने लाल बत्ती को राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तक सीमित करने की बात की है और उमर अब्दुल्ला ने तो अपने वाहन से इसे हटाने का ऐलान भी कर दिया है; उम्मीद करनी चाहिए कि संसद भी जल्दी इस संबंध में कानूनों में जरूरी संशोधन करेगी। ध्यान रहे, इसके ही साथ उस तंत्र को भी दुरुस्त करने की जरूरत है, जिसके जिम्मे कानूनों के अमल की जिम्मेदारी होती है।

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