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सत्ता और सेंसेक्स
नई दिल्ली
Updated Tue, 13 May 2014 07:27 PM IST
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लोकसभा चुनावों के नतीजे आने से पहले ही शेयर बाजार में जिस तरह की तेजी दिख रही है, उसे यदि संकेत मानें, तो एक्जिट पोल की तरह निवेशक भी यह मानकर चल रहे हैं कि केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुआई में एनडीए की सरकार बन रही है। मुंबई शेयर बाजार के सूचकांक ने पहली बार 24,000 के आंकड़े को छुआ है और नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का सूचकांक निफ्टी 7,000 के आंकड़े के पार जा चुका है।
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आम चुनावों के नतीजे आने के समय बाजार में इस तरह की हलचल नई बात नहीं है। लेकिन यूपीए सरकार के कार्यकाल के आखिरी डेढ़-दो वर्ष जिस तरह के बीते हैं, उसने निवेशकों का भरोसा तोड़कर रख दिया। यूपीए सरकार की ऐसी छवि बन गई कि वह कोई फैसले नहीं लेती, जिसका असर आर्थिक विकास पर भी दिखा।
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बाजार में अभी आई तेजी के पीछे यह भरोसा भी है कि केंद्र में न केवल एक स्थिर सरकार आ रही है, बल्कि वह निर्णायक फैसले भी लेगी। यह तेजी नरेंद्र मोदी के प्रति बाजार और निवेशकों के भरोसे को दर्शा रही है। हालांकि इसके पीछे संस्थागत विदेशी निवेशकों की अहम भूमिका है, जिससे एक खतरा यह भी बना हुआ है कि यदि एनडीए बहुमत से कुछ पीछे रह जाए और उसे सरकार बनाने के लिए नए दलों की तलाश करनी पड़े, तो उसका असर भी बाजार में तुरंत दिख सकता है। आखिर यह वही बाजार है, जहां 2004 में यूपीए सरकार के गठन में वामपंथी दलों के समर्थन के कारण मायूसी छा गई थी!
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दरअसल बाजार के मौजूदा रुख को देखते हुए छोटे निवेशकों को कहीं अधिक सतर्क रहने की जरूरत है, क्योंकि विदेशी संस्थागत निवेशक तो मौका देखकर हाथ भी खींच लेते हैं। वास्तव में यह तेजी मोदी और भाजपा के बाजारोन्मुखी दृष्टिकोण की ही पुष्टि करती है।
गौर करने वाली बात यह है कि सिर्फ सरकारी उपक्रमों ही नहीं, बिजली कंपनियों और बैंकिंग के साथ खुदरा कंपनियों के शेयरों में भी तेजी आई है, जिससे नई सरकार से बाजार की अपेक्षाओं को समझा जा सकता है। हालांकि 16 मई के बाद केंद्र में जिसकी भी सरकार बनेगी उसे विरासत में एक चुनौतीपूर्ण अर्थव्यवस्था मिलने वाली है। उसे पहली चुनौती महंगाई के मोर्चे पर मिलेगी, जिसके ताजा आंकड़े आठ फीसदी के पार चले गए हैं।