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पद और व्यक्तित्व
नई दिल्ली
Updated Tue, 02 Sep 2014 07:52 PM IST
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नरेंद्र मोदी सरकार के गठन के बाद से नियुक्त किए जा रहे राज्यपालों की सूची में अब पूर्व मुख्य न्यायाधीश पी सदाशिवम का नाम भी जुड़ रहा है, जिससे इस पद के औचित्य और उसकी गरिमा को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है। असल में राज्यपाल के पद का जिस तरह से राजनीतिकरण हुआ है, उससे इस पद पर होने वाली हर नियुक्ति को राजनीति के चश्मे से ही देखा जाता है।
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कांग्रेस भले ही ऐसी नियुक्तियों का विरोध करे, मगर यह परंपरा उसी ने शुरू की थी। पर जस्टिस सदाशिवम का मामला पिछले सारे मामलों से इसलिए अलग है, क्योंकि ऐसा पहली बार हो रहा है, जब किसी पूर्व मुख्य न्यायाधीश को राज्यपाल के पद पर नियुक्त किया जा रहा है।
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सांविधानिक रूप से इस तरह की नियुक्ति में कोई अड़चन नहीं है, लेकिन हमारे देश में न्यायपालिका का जो स्वतंत्र अस्तित्व है, उसे देखते हुए पूर्व न्यायाधीश को राज्यपाल बनाए जाने पर बहस स्वाभाविक है। राष्ट्रीय मानवाधिकार और ग्रीन ट्रिब्यूनल जैसे आयोगों के अध्यक्ष के रूप में पूर्व मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति होती रही है, पर चूंकि ये राजनीतिक पद नहीं हैं, इसलिए अमूमन इन्हें लेकर विवाद नहीं होता।
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बात सिर्फ न्यायपालिका की नहीं है, कैग और चुनाव आयोग जैसे सांविधानिक संस्थाओं के उच्च पदों पर रहे व्यक्तियों को सेवानिवृत्ति के बाद मंत्री या राज्यपाल बनाए जाने के उदाहरण भी सामने हैं- फिर वह यूपीए सरकार के दौरान मंत्री रहे पूर्व चुनाव आयुक्त एम एस गिल हों या पिछली एनडीए सरकार के समय राज्यपाल बनाए गए पूर्व नियंत्रक और महालेखा परीक्षक टीएन चतुर्वेदी।
जहां तक उच्चतर न्यायिक पद से सेवानिवृत्त हस्तियों की राजनीतिक नियुक्ति की बात है, तो अब तक एकमात्र पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एम हिदायतुल्ला ही उपराष्ट्रपति बनाए गए थे। उनके अलावा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के पूर्व जज गोपाल स्वरूप पाठक भी उपराष्ट्रपति बनाए गए थे। उल्लेखनीय है कि उपराष्ट्रपति का पद प्रोटोकॉल के लिहाज से राष्ट्रपति के बाद आता है और प्रधानमंत्री से पहले। इसलिए इन दोनों की नियुक्ति को लेकर विवाद नहीं हुआ।
वैसे भी उच्चतर पदों पर प्रबुद्ध लोगों की नियुक्तियों से इन पदों की गरिमा ही बढ़ती है। वास्तव में राजनीतिक नियुक्तियों के कारण राज्यपाल का पद महत्व खोता जा रहा है। फिर भी जस्टिस सदाशिवम के विवेक पर यह फैसला छोड़ना ठीक होगा।