आरक्षण पर राजनीति
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सामाजिक-आर्थिक बराबरी का लक्ष्य हासिल करने के लिए संविधान में जिस आरक्षण की व्यवस्था की गई थी, वह लक्ष्य पूरा हुआ या नहीं, यह बहस का मुद्दा है, पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने जिस अधिकार के साथ आरक्षण की मौजूदा व्यवस्था की समीक्षा करने का सुझाव दे डाला है, वह स्तब्ध करने वाला है। सिर्फ यही नहीं कि संघ अपनी ब्राह्मणवादी सोच के लिए जाना जाता है, जिसका आरक्षण जैसे सामाजिक बराबरी के औजार पर बहुत विश्वास नहीं है, तिस पर केंद्र में भाजपा की सरकार होने के बाद से संघ का सरकारी कामकाज में हस्तक्षेप बढ़ना उसकी मंशा बताने के लिए काफी है।
बेशक आरक्षण ने कमजोर वर्ग में एक मलाईदार तबका भी पैदा किया है, जिसके कारण इसका पूरा लाभ जरूरतमंदों को नहीं मिल पाता, पर इसका मतलब यह नहीं कि आरक्षण की व्यवस्था ही खत्म कर दी जाए। दरअसल आरक्षण में व्याप्त विसंगतियां राजनीतिक पार्टियों की सोच का नतीजा हैं, जिनके लिए आरक्षण अपनी सत्ता बचाए रखने का औजार है। भाजपा अगर आरक्षण की व्यवस्था की समीक्षा के मोहन भागवत के सुझाव से सहमत नहीं है, तो सिर्फ इसलिए नहीं कि वह अभी बिहार विधानसभा का चुनाव लड़ रही है, जहां आरक्षण की समीक्षा की बात करना अपना नुकसान करना है।
भागवत से उसकी असहमति की वजह राजस्थान में वसुंधरा सरकार का वह ताजा फैसला भी है, जिसमें गुर्जर सहित दूसरी जातियों को पांच फीसदी तथा आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों को चौदह प्रतिशत आरक्षण देने की बात है। इससे वहां आरक्षण की सीमा सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय पचास फीसदी की सीमा से बढ़कर अड़सठ फीसदी हो गई है। अपने पिछले कार्यकाल में भी वसुंधरा सरकार ने आरक्षण की ऐसी ही पहल की थी, जिस पर अदालत ने रोक लगाई थी। इसके बावजूद सरकारें सियासी लाभ के लिए आरक्षण की पहल करती रहती हैं। कई ऐसे राज्य हैं, जहां आरक्षण तयशुदा पचास फीसदी से अधिक है, तो इसकी वजह राजनीतिक लाभ लेने की यह प्रवृत्ति ही है। जरूरत इस राजनीति पर अंकुश लगाने की है, जो आरक्षण को हर मर्ज की दवा मान लेती है। जब ऐसा होगा, तभी आरक्षण का अधिक से अधिक लाभ समाज के वंचित तबकों को मिल पाएगा।