फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Other Archives ›   politics on governor

राज्यपाल पर राजनीति

Thu, 19 Jun 2014 07:28 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Thu, 19 Jun 2014 07:28 PM IST
विज्ञापन
politics on governor

केंद्र की सत्ता में आने के बाद एनडीए सरकार की कुछ राज्यों के राज्यपालों को बदलने की कवायद अप्रत्याशित नहीं है। दरअसल सांविधानिक पद होने के बावजूद केंद्र सरकार और सत्तारूढ़ दल राज्यपालों को अपने एजेंट की तरह ही इस्तेमाल करते रहे हैं।

विज्ञापन


खुद यूपीए ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान 2004 में अटल बिहारी वाजपेयी की अगुआई वाली एनडीए सरकार के समय नियुक्त कुछ राज्यपालों को हटाया था, जिस पर काफी विवाद हुआ था। यूपीए के उस कदम को चुनौती दिए जाने पर सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट किया था कि राज्यपाल कोई सरकारी कर्मचारी नहीं है कि सरकार बदलने के बाद उसे हटा दिया जाए। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया था कि राज्यपाल को हटाने के पीछे ठोस वैधानिक वजह होनी चाहिए।
विज्ञापन


मुश्किल यह है कि राज्यपाल के पद की व्यवस्था जिस तरह से की गई है, उसमें ही विसंगतियां दिखती हैं। अनुच्छेद 156 (1) के मुताबिक, राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति की इच्छा से की जाती है। यानी राष्ट्रपति चाहें, तो बिना कारण बताए उसे हटा भी सकते हैं और ऐसा वह सरकार की सलाह पर ही कर सकते हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


असल में जब तक केंद्र और राज्य में सिर्फ कांग्रेस पार्टी की सरकारों का दौर था, तब तक राज्यपाल को लेकर टकराव की बहुत गुंजाइश नहीं थी, मगर भारतीय राजनीति में दूसरे दलों के मजबूत होने और गठबंधन राजनीति के दौर की शुरुआत होने के बाद राज्यपाल का पद केंद्र और राज्य के बीच टकराव का सबब बन गया है। कुछ संविधान विशेषज्ञों की राय है कि राज्यपाल का पद संघीय ढांचे को ही कमजोर कर रहा है! यदि राज्यपाल के पद को लेकर इसी तरह टकराव जारी रहा, तो इस पद के औचित्य पर भी सवाल उठेंगे।


असल में संविधान सभा में भी राज्यपाल के पद को लेकर काफी बहस हुई थी और माना गया था कि इस पद पर विभिन्न क्षेत्रों के विद्वान और अनुभवी व्यक्ति पदासीन होंगे, पर बाद में यह पद सत्तारूढ़ दल के नेताओं के लिए राजनीतिक पुनर्वास का जरिया बन गया। ऐसे में अपने दम पर बहुमत हासिल कर सत्ता में आई भाजपा यदि अपने लोगों को राज्यपाल के रूप में देखना चाहती है, तो यह इसी राजनीतिक परंपरा की वजह से है। टकराव के बजाय अच्छा तो यह होता कि जिन राज्यपालों का कार्यकाल जल्दी खत्म होने वाला है, कम से कम उनकी सेवानिवृत्ति तक इंतजार कर लिया जाता।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed