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खाद्य सुरक्षा पर राजनीति

Thu, 22 Aug 2013 08:04 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Thu, 22 Aug 2013 08:04 PM IST
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politics on food security

दुनिया के करीब तैंतीस फीसदी गरीब जिस देश में रहते हैं, वहां बेहतर तो यही होता कि खाद्य सुरक्षा कानून को संसद में पारित करवाने में सभी राजनीतिक दल एकजुट होते। लेकिन संसद के छोटे से मानसून सत्र में खाद्य सुरक्षा विधेयक पर सत्ता पक्ष और विपक्ष में जैसी व्यूह रचना हो रही है, वह उदास ही ज्यादा करती है। अगले चुनाव को ध्यान में रखकर सरकार अगर इसी सत्र में खाद्य सुरक्षा विधेयक को पारित कराने के बारे में सोच रही है, तो विपक्ष, खासकर भाजपा उसे यह श्रेय देने को तैयार नहीं है।

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सरकार के प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून पर विपक्ष को ऐतराज हो सकता है, लेकिन उसमें राजनीति नहीं होनी चाहिए। इसके ब्योरे हैं कि सरकार खाद्य सुरक्षा विधेयक से संबंधित विपक्षी पार्टियों के पंद्रह संशोधनों पर राजी है। वह विपक्ष की दूसरी आपत्तियों पर भी विचार कर सकती है, बशर्ते विपक्ष संसद में बहस तो होने दे। लेकिन अब तक सुस्त पड़ी भाजपा संसद में अचानक जिस तरह आक्रामक हो उठी है, उसके पीछे इस विधेयक को लटकाने की उसकी रणनीति भी हो सकती है।
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अलबत्ता इस मामले में सरकार ने अब तक जिस जल्दबाजी का परिचय दिया है, उसकी भी तारीफ नहीं की जा सकती। मानसून सत्र से ठीक पहले उसे खाद्य सुरक्षा अध्यादेश जारी नहीं करना चाहिए था। ऐसा कानून बनना ही चाहिए, जिससे गरीबों को रियायती दर पर अनाज मिल पाए। लेकिन ऐसा कोई भी कानून जल्दबाजी में और संसद की अनदेखी कर क्यों बनना चाहिए?
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तथ्य यह भी है कि तमिलनाडु और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में गरीबों के लिए ऐसा कानून पहले से ही न सिर्फ लागू है, बल्कि वह केंद्र के प्रस्तावित खाद्य सुरक्षा कानून से बेहतर भी है। यूपीए सरकार अगर सचमुच गरीबों की खैरख्वाह होती, तो वह उसी के अनुरूप कानून बनाने की सोचती। लेकिन ऐसा तो उसने किया नहीं, उलटे कांग्रेस शासित चार राज्यों में राजीव गांधी के जन्मदिन पर यह कानून लागू कर उसने अपने इरादे साफ कर दिए हैं।


अब वह मौजूदा मानसून सत्र एक सप्ताह बढ़ाने के बारे में सोच रही है, ताकि इसी सत्र में खाद्य सुरक्षा कानून पर सहमति बन जाए। साफ है कि गरीबों की बेहतरी के बजाय अपनी राजनीति चमकाने की चिंता उसे ज्यादा है।

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