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ध्रुवीकरण की राजनीति

Fri, 04 Apr 2014 08:01 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Fri, 04 Apr 2014 08:01 PM IST
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politics of polarisation
लोकसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान से महज तीन दिन पहले जिस तरह से राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का मसला एक बार फिर सामने आया है, उसने एक साथ कई तरह के सवालों, संदेहों और आशंकाओं को जन्म दे दिया है।
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एक वेब पोर्टल ने स्टिंग ऑपरेशन के जरिये दावा किया है कि छह दिसंबर, 1992 का घटनाक्रम अयोध्या में पहुंचे कारसेवकों के बेकाबू होने या भीड़ के उन्माद का नतीजा नहीं था, बल्कि इसके पीछे संघ परिवार और भाजपा की सुनियोजित साजिश थी और इसमें भाजपा के शीर्ष नेताओं के साथ ही तत्कालीन कांग्रेसी प्रधानमंत्री नरसिंह राव तक की संदिग्ध भूमिका थी!
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ऐसे वक्त में जब देश के सामने विकास और सुशासन तथा भ्रष्टाचार से निपटने की चुनौती है, यह दावे से नहीं कहा जा सकता कि यह मुद्दा वाकई किसी भी पार्टी के लिए कितने काम का है। मगर इसके जरिये राजनीतिक ध्रुवीकरण की कोशिशें देखी जा सकती हैं।
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जामा मस्जिद के शाही इमाम की सार्वजनिक तौर पर कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के पक्ष में मुस्लिमों से वोट डालने के लिए की गई अपील को भी इसी राजनीति के हिस्से के रूप में देखना चाहिए। दूसरी ओर भाजपा चाहे लाख दावा करे, लेकिन उसके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी अपनी कट्टर छवि से बाहर नहीं निकल सके हैं, लिहाजा उनके विरोधियों को सांप्रदायिक आधार पर उन पर हमले करना मुफीद लगता है।

भाजपा इस स्टिंग के पीछे एक बड़ी साजिश देख रही है; मगर लोकसभा की 80 सीटों वाले उत्तर प्रदेश से दिल्ली जाने की तैयारी कर रहे उसके रणनीतिकार भी जानते हैं कि यदि वाकई राजनीतिक ध्रुवीकरण होता है, तो इसका सर्वाधिक लाभ भाजपा को हो सकता है।

दूसरी ओर अपने सबसे चुनौतीपूर्ण चुनाव का सामना कर रही कांग्रेस को भी शायद लग रहा हो कि ऐसे किसी भी ध्रुवीकरण से समाजवादी पार्टी तथा बहुजन समाज पार्टी से टूट रहे मुस्लिम मतदाता उसकी ओर लौट सकते हैं। यह विडंबना ही है कि सांप्रदायिकता बनाम धर्मनिरपेक्षता की बहस में चुनाव के असली मुद्दों को दरकिनार करने की कोशिशें की जा रही हैं।


हमारे राजनीतिक दल शायद भूल रहे हैं कि इस देश के युवा आज संख्या और क्षमता के लिहाज से निर्णायक स्थिति में हैं, जिनके लिए उच्च शिक्षा, रोजगार और विकास से जुड़े मुद्दे कहीं अधिक अहमियत रखते हैं।
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