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लोकपाल की राजनीति
नई दिल्ली
Updated Mon, 16 Dec 2013 07:46 PM IST
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पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में मिली घनघोर पराजय से पस्त कांग्रेस के लिए इससे मुफीद और क्या हो सकता है कि प्रमुख विपक्षी दल भाजपा सहित तमाम राजनीतिक दल प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लोकपाल के मुद्दे पर उसकी नैया पार कराने को तैयार दिख रहे हैं।
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महज दो वर्ष पहले एक मजबूत लोकपाल के गठन की मांग को लेकर जिन अन्ना हजारे ने यूपीए सरकार की चूलें हिला कर रख दी थीं, आज वही उसके नए बने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी अरविंद केजरीवाल के खिलाफ सबसे बड़ा कवच साबित हो रहे हैं!
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प्रचलित राजनीतिक अवधारणाओं के लिहाज से देखें, तो यह ठीक लगता है कि चाहे जैसे भी हो, जिस लोकपाल बिल पर काफी मशक्कत हो चुकी है, मोटे तौर पर सीबीआई और लोकायुक्त से संबंधित मांगें मंजूर कर ली गई हों, तब इसे संसद में पारित करवा लिया जाना चाहिए। मगर आम आदमी पार्टी ने राजनीति का जो नया मुहावरा गढ़ा है, दरअसल उसमें उसकी अव्यवहार्य-सी दिखने वाली जिद ही उसकी राजनीति का व्यावहारिक पक्ष है।
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इसमें भी संदेह नहीं कि राज्यसभा में लोकपाल का जो रूप अब है, वह अपने मूल रूप से काफी बदल चुका है, मगर जब तक सीबीआई की स्वतंत्रता सुनिश्चित नहीं होगी, भ्रष्टाचार के खिलाफ कोई भी पहल भोथरी ही साबित होगी। निश्चय ही, भ्रष्टाचार के खिलाफ सिर्फ एक मजबूत लोकपाल ही नहीं, पूरे तंत्र की गंदगी को दूर करने की जरूरत है, जिसके लिए जरूरी है कि राजनीतिक संस्कृति भी बदले।
कांग्रेस और भाजपा जैसे दलों की मुश्किल यही है कि वे आम आदमी पार्टी की नई राजनीतिक शैली को या तो ठीक से समझ नहीं पाए हैं, या जानबूझकर उसे खारिज करना चाहते हैं। दूसरी ओर दिल्ली में आम आदमी पार्टी को मिली 28 सीटें उस नई राजनीतिक शैली की स्वीकार्यता को ही बता रही हैं, जिसमें व्यवस्था बदलने, या कहें सरकार चलाने में आम जनता की सहभागिता की बात की गई है।
कांग्रेस और भाजपा के लिए यह चिंता की बात होगी कि यदि आम आदमी पार्टी दिल्ली की अपनी प्रयोगशाला से बाहर निकलकर उनके सामने 2014 में भी ऐसी ही चुनौती पेश करे, तो क्या होगा? ऐसे में लोकपाल पर केजरीवाल और उनके साथियों का अलग-थलग पड़ना उन्हें सुहा रहा हो, तो हैरत नहीं।