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राष्ट्रीय एकता के बहाने
नई दिल्ली
Updated Tue, 24 Sep 2013 08:21 PM IST
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उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में हुई सांप्रदायिक हिंसा की पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय एकता परिषद की सोलहवीं बैठक वैसे तो धर्मनिरपेक्षता के तंतुओं को मजबूत करने के लिए बुलाई गई थी, लेकिन उसमें राजनीतिक शख्सियतों की मौजूदगी-गैरमौजूदगी लोकसभा चुनाव से पहले संप्रग और राजग के पक्ष में धड़ेबंदी की कवायद ही ज्यादा लगती थी।
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बैठक में गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की अनुपस्थिति वाकई आश्चर्यजनक थी। भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनने के लिए जिस शख्स ने लगातार अपनी महत्वाकांक्षा का परिचय दिया, 'धर्मनिरपेक्षता' पर उनके विचार जानने का पूरे देश को हक है। यह क्यों न मानें कि इस मुद्दे पर अपनी असहजता के कारण ही नरेंद्र मोदी ने गैरमौजूदगी का विकल्प चुना, और शिवराज सिंह चौहान को विरोधियों का वार झेलने के लिए अकेला छोड़ दिया!
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बैठक में अलबत्ता धर्मनिरपेक्ष राजनीति के अलंबरदारों के दावे भी जमीनी कम, हवाई ज्यादा थे। इससे इन्कार नहीं कि मुजफ्फरनगर में सांप्रदायिक हिंसा को सुनियोजित ढंग से तूल दिया गया, पर सत्ताधारी सपा इसके लिए केवल भाजपा को दोषी ठहराकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।
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इसी तरह भाजपा के साथ लंबा गठजोड़ निभाकर थोड़े दिन पहले रिश्ता तोड़ने वाले नीतीश कुमार को वह पार्टी तो अब सांप्रदायिक लगती है, पर उसी के पूर्व अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी से नजदीकी बरतने में उन्हें मुश्किल नहीं है! नरेंद्र मोदी, रमन सिंह, प्रकाश सिंह बादल, जयललिता आदि की गैरमौजूदगी का मतलब साफ था कि वे आगामी लोकसभा चुनाव में राजग का हिस्सा होंगे, लेकिन ममता बनर्जी, नवीन पटनायक और मायावती की गैरमौजूदगी की क्या व्याख्या हो सकती है?
जाहिर है, धर्मनिरपेक्षता पर केंद्रित होने के बावजूद राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक का सबने अपने-अपने हित के मुताबिक इस्तेमाल किया। चूंकि इस मामले में खुद संप्रग की नीति भी तुष्टिकरण से आगे नहीं जाती, लिहाजा इस तरह की एक महत्वाकांक्षी बैठक बुलाकर भी वह कोई प्रभावी संदेश नहीं दे पाया। जब अपने राजनीतिक हित धर्मनिरपेक्षता की रक्षा पर भारी पड़ते हों, तब राष्ट्रीय एकता परिषद की बैठक से भी कोई क्या उम्मीद कर सकता है!