फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   Other Archives ›   politics in bharat bandh

भारत बंद में भी राजनीति

Mon, 24 Sep 2012 02:58 PM IST
Updated Mon, 24 Sep 2012 02:58 PM IST
विज्ञापन
politics in bharat bandh

लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में सरकार की रीति-नीतियों का विरोध करने का जनता को अधिकार है, इसलिए डीजल मूल्यवृद्धि, रसोई गैस में कटौती और रिटेल में सीधे विदेशी निवेश को मंजूरी संबंधी कैबिनेट के फैसले के खिलाफ विपक्षी दलों द्वारा आयोजित भारत बंद को गलत नहीं ठहराया जा सकता।

विज्ञापन


हकीकत यह है कि यूपीए की आर्थिक नीतियों ने लगातार मूल्यवृद्धि को ही प्रोत्साहित किया है, जिसका नुकसान मध्यवर्ग और गरीबों को होता है। पर कल के भारत बंद में विपक्षी दलों का रवैया देखने लायक था। इससे इनकार नहीं कि रसोई गैस में कटौती और डीजल में एकमुश्त पांच रुपये की बढ़ोतरी का आम आदमी से लेकर अर्थव्यवस्था पर बड़ा असर पड़ेगा। पर जो भाजपा, राजग के शासन काल में आर्थिक नीतियों के मामले में कांग्रेस को भी मात देती दिखाई पड़ी, उसका एफडीआई रिटेल पर हायतौबा मचाना हजम नहीं होता।
विज्ञापन


अगर वह केंद्र की सत्ता में वापस लौटी, तो क्या ऐसे फैसलों को पलटने का साहस दिखा पाएगी? उदार आर्थिक नीतियों के खिलाफ वाम दलों की लड़ाई विश्वसनीय रही है, लेकिन सांप्रदायिकता को सबसे बड़ा खतरा बताने वाले कम्युनिस्टों को जंतर-मंतर पर भाजपा नेताओं के साथ खड़े होने में कोई मुश्किल नहीं आई। समाजवादी पार्टी का अंतर्विरोध तो छिपाए भी नहीं छिपता। उसने इस बंद में बढ़-चढ़कर भाग लिया, बावजूद इसके कि नई अर्थनीति का विरोध उसके स्वभाव में नहीं है, और संकट की हर घड़ी में उसने केंद्र सरकार का साथ दिया है।
विज्ञापन
विज्ञापन


जाहिर है, अभी केंद्र के साथ अंदरूनी तालमेल बनाए रखते हुए सपा बाहर से उसके खिलाफ जाने का आभास दे रही है, जो उसकी अस्थिर राजनीति का ही उदाहरण है। सबसे दिलचस्प उदाहरण तो ममता बनर्जी का है। यूपीए के इन्हीं सख्त फैसलों के खिलाफ तृणमूल ने दो दिन पहले समर्थन वापसी की घोषणा की, लेकिन इस बंद में वह इसलिए शामिल नहीं हुई, क्योंकि इससे भाजपा और वाम दल जुड़े थे! बंद से अलग रहकर दीदी ने अपनी जनता को आखिर क्या संदेश दिया है? यही हाल भारतीय राजनीति की दूसरी दो देवियों, जयललिता और मायावती, का रहा, जो बंद में इसलिए शामिल नहीं हुईं, क्योंकि उनके विरोधी दल इसमें शामिल थे। क्या विडंबना है, आम लोगों के हित में आयोजित बंद भी क्षुद्र राजनीति से मुक्त नहीं है!

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed