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बांग्लादेश का सियासी संकट

Mon, 30 Dec 2013 07:57 PM IST
नई दिल्ली
नई दिल्ली Updated Mon, 30 Dec 2013 07:57 PM IST
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Political crisis of Bangladesh

ढाका की सड़कों पर फैली अराजकता ने बांग्लादेश में लोकतंत्र के लिए नई मुश्किलें खड़ी कर दी हैं। वहां पांच जनवरी को आम चुनाव होने हैं, लेकिन हालात ऐसे बन गए हैं कि ट्रेन और बसों के ठप होने के कारण राजधानी ही पूरे देश से अलग-थलग पड़ गई है।

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विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की नेता खालिदा जिया की चुनाव बहिष्कार की जिद ने बांग्लादेश को सांविधानिक संकट के मुहाने पर ला खड़ा किया है। शेख हसीना सरकार का कार्यकाल 24 जनवरी को पूरा हो रहा है, और वहां के संविधान के मुताबिक, संसद का कार्यकाल पूरा होने से 90 दिन पहले चुनाव हो जाने चाहिए। मगर बीएनपी और तमाम विपक्षी दलों के चुनावों में हिस्सा नहीं लेने से ये चुनाव बेमानी हो सकते हैं।
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बेशक, एक निष्पक्ष लोकतांत्रिक सरकार के गठन के लिए जरूरी है कि आम चुनाव भी निष्पक्ष तरीके से हों, मगर इसका यह मतलब नहीं कि पूरे देश को हिंसा और आग के हवाले कर दिया जाए। फिर यह भी नहीं भूलना चाहिए कि बीएनपी की प्रमुख सहयोगी जमात ए इस्लामी है, जिस पर देश विरोधी नीतियों के कारण प्रतिबंध लगा हुआ है। यही नहीं, इसके एक नेता अब्दुल कादिर मुल्ला को 1971 के बंग मुक्ति संग्राम में देशद्रोह का दोषी पाए जाने पर थोड़े दिन पहले ही फांसी दी गई है, जिसे कट्टरपंथी मुद्दा बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
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गरीबी और बेरोजगारी से जूझ रहे इस देश की त्रासदी ही है कि यह करीब दो दशक से दो नेत्रियों की आपसी प्रतिद्वंद्विता का अखाड़ा बन गया है। असल में, बांग्लादेश के संविधान में पहले तटस्थ सरकार की अगुवाई में चुनाव कराए जाने का प्रावधान था, जिसे शेख हसीना की सरकार बनने के बाद पलट दिया गया। अभी जैसे हालात हैं, उसमें निर्वाचन आयोग की भी मुश्किलें बढ़ गई हैं, क्योंकि चुनाव को हफ्ते भर भी नहीं रह गए हैं और स्थिति साफ नहीं है।


दरअसल 2006 में खालिदा जिया की सरकार के कार्यकाल पूरा होने के बाद कार्यवाहक सरकार का गठन किया गया था, मगर वहां जिस तरह की अराजकता फैली, उसमें दो वर्ष बाद ही चुनाव संभव हो सके थे। वहां के तमाम राजनीतिक दलों को समझना चाहिए कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया का कायम रहना न केवल उनके, बल्कि देश के अस्तित्व के लिए भी जरूरी है।

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