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भूटान में बदलाव का अर्थ

Mon, 15 Jul 2013 03:51 PM IST
Updated Mon, 15 Jul 2013 03:51 PM IST
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political change in bhutan

पड़ोसी देश भूटान में हुए चुनाव में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत से साफ है कि रसोई गैस और केरोसिन पर सब्सिडी हटने से नाराज मतदाताओं ने डीपीटी को सबक सिखाया है, क्योंकि दो महीने पहले के शुरुआती चुनावी मुकाबले में भी डीपीटी मजबूत स्थिति में थी।

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पूर्व प्रधानमंत्री जिग्मे थिनले के प्रति भारत की नाराजगी, बढ़ती महंगाई, पूर्व सरकार के कुछ मंत्रियों के भ्रष्टाचार के मामले सार्वजनिक होने और पीडीपी द्वारा एक छोटी पार्टी के साथ गठबंधन करने के बावजूद डीपीटी हालांकि उस तरह हाशिये पर नहीं है, जिस तरह पिछले चुनाव में पीडीपी थी; सैंतालीस सीटों वाले निचले सदन में उसके हिस्से में पंद्रह सीटें आई हैं।
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हां, यह अजीब जरूर है कि भूटान में लोकतंत्र की स्थापना के बाद जिस सरकार ने ग्रामीण इलाकों में सड़कों का जाल बिछाया, मोबाइल सेवा शुरू की और गरीबी कम करने में भी सफलता हासिल की, उसने बाद के दिनों में भारत की नाराजगी को बहुत गंभीरता से नहीं लिया।
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वह यह भी नहीं भांप पाई कि ठीक चुनाव से पहले भारत की ओर से सब्सिडी हटने का उसको नुकसान हो सकता है।

बत्तीस देशों के साथ राजनयिक संबंध बनाकर और पूर्व चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ से मुलाकात कर पिछली सरकार ने उस भारत का भरोसा तोड़ दिया था, जो न सिर्फ भूटान का मुख्य आर्थिक सहयोगी है, बल्कि उसकी पंचवर्षीय योजनाओं में करीब सत्तर फीसदी योगदान करता है।

इस चुनाव में भी नई दिल्ली ने थिंपू को वोटिंग मशीनें तो दी ही, मुख्य चुनाव आयुक्त वहां प्रेक्षक की हैसियत से मौजूद थे।

पीडीपी के नेतृत्व में भारत-भूटान रिश्ते बेहतर होंगे, इसकी दो वजहें हैं। एक तो खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने पीडीपी अध्यक्ष और भावी प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे को बधाई के अलावा मिलकर काम करने का भरोसा दिया है।


दूसरे, पीडीपी का गठन चूंकि राजशाही से जुड़े लोगों ने किया है, इसलिए उसकी विदेश नीति में भारत को सर्वाधिक वरीयता दी गई है।

भूटान की नई सरकार के सामने महंगाई से त्रस्त जनता को राहत देने की चुनौती तो है ही, देखना यह भी है कि 'नेशनल हैप्पीनेस इंडेक्स' को शोशेबाजी बताने वाली पीडीपी देश की आम जनता की खुशहाली के लिए कौन-सा रास्ता अख्तियार करती है।

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